अयोध्या: मुख्यमंत्री योगी ने गोरक्षपीठ व दिगंबर अखाड़ा के रिश्ते को नया आयाम दिया
परमहंस रामचंद्र दास व ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ…अद्भुत थीं दोनों विभूतियां। अलौकिक थी उनकी आभा। दोनों में पक्की दोस्ती। राममंदिर निर्माण का संकल्प भी सधा हुआ। हर मुश्किल साथ झेली। डटे रहे। संकल्प की सिद्धि के लिए अड़े रहे। परिणाम आज सामने है। अयोध्या में रामलला विराजमान हैं। राम नगरी की अनुपम छटा विश्व में बिखर रही है।
बुधवार को सीएम योगी ने परमहंस रामचंद्र दास की मूर्ति का जब अनावरण किया तो गोरक्षपीठ व दिगंबर अखाड़ा के रिश्ते को नया आयाम मिला। इस दौरान सीएम ने गुरु अवेद्यनाथ व परमहंस की दोस्ती के किस्से भी सुनाए।
रामनगरी और दिगंबर अखाड़ा का रिश्ता अवेद्यनाथ तक ही नहीं बल्कि उनके गुरु दिग्विजयनाथ के समय से ही प्रगाढ़ है । योगी बाल्यकाल से ही गुरु के साथ दिगंबर अखाड़ा आते रहे हैं। कई मौके पर सीएम ने कहा भी है कि गोरखपुर के बाद उनका दूसरा घर रामनगरी है। इसके पीछे की अपनी अलग ही कहानी है।
राममंदिर आंदोलन ने गोरक्षपीठ से दिगंबर अखाड़ा से रिश्तों को नया आयाम दिया। आंदोलन के दौरान महंत अवेद्यनाथ रामनगरी आए तो दिगंबर अखाड़ा में ही अपना ठिकाना बनाया। इस दौरान रामचंद्र परमहंस से उनकी निकटता बढ़ती चली गई। मंदिर आंदोलन का पूरा ताना-बाना रामचंद्र दास परमहंस व अवेद्यनाथ के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा।
1984 में श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन ः महंत अवेद्यनाथ ने 1984 में श्री राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया था। इसके जरिये उन्होंने सभी हिंदू संगठनों और साधु-संतों को एक मंच पर लाने का काम किया। 31 अक्तूबर, 1985 को कर्नाटक के उडुपी में धर्म संसद हुई।
इस दौरान महंत अवेद्यनाथ और महंत रामचंद्र दास परमहंस ने मस्जिद का ताला खोलने की मांग रखी, ताकि भक्त वहां पर पूजा-पाठ कर सकें। इस मांग को आगे बढ़ाने के लिए अखिल भारतीय संघर्ष समिति का भी गठन किया गया। एक फरवरी, 1986 को जब फैजाबाद के जज ने ताला खोलने का आदेश दिया, तब अवेद्यनाथ अयोध्या में ही थे।
गोरक्षपीठ व दिगंबर अखाड़ा एक-दूसरे के पूरक
सीएम योगी ने मूर्ति अनावरण समारोह में कहा कि गोरक्षपीठ गोरखपुर और दिगंबर अखाड़ा अयोध्या वर्ष 1940 से ही एक दूसरे के पूरक रहे। रामचंद्र दास महराज जब बचपन में अयोध्या धाम आए थे, तबसे उनका लगाव गोरक्षपीठ से था। तत्कालीन गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ के सानिध्य में रहकर राम जन्मभूमि आंदोलन आगे बढ़ा।
1949 में रामलला के प्रकटीकरण के साथ ही तत्कालीन सरकार की ओर से प्रतिमा को हटाने की चेष्टा के खिलाफ न्यायालय में जाने और वहां से सड़क तक इस लड़ाई को बढ़ाने का कार्य गोरक्षपीठ व पूज्य संत परमहंस रामचंद्र दास ने मिलकर किया। पूज्य संतों की साधना फलीभूत हुई और 500 वर्षों का इंतजार समाप्त हुआ।
राममंदिर आंदोलन में गोरक्षपीठ की रही है प्रमुख भूमिका
राममंदिर को लेकर जब भी 500 वर्षों के संघर्षों और आंदोलनों का जिक्र होगा उसमें गोरक्षपीठ की भूमिका का जिक्र सदा रहेगा। सीएम योगी आदित्यनाथ के गुरु गोरक्षपीठाधीस्वर अवेद्यनाथ मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरा थे। वो श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष थे।
महंत अवेद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने बाद जब तक यह आंदोलन चला योगी आदित्यनाथ भी उसे धार देते रहे। वो हमेशा कहते रहे हैं कि राम मंदिर चुनावी मुद्दा नहीं, मेरे लिए जीवन का मिशन है। राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण और वहां भगवान की प्राण प्रतिष्ठा सीएम के गुरु अवेद्यनाथ की आखिरी इच्छा थी, जिसे उन्होंने पूरा करके दिखाया।









