सोनिया गांधी के लिए ये एक सुकून भरा लम्हा है। राहुल और प्रियंका गांधी को भी अब इस बात की तसल्ली मिल गई है कि कम से कम अब पार्टी पर परिवारवाद औऱ वंशवाद का आरोप लगाने वालों को झटका लगा है। मल्लिकार्जुन खरगे का कांग्रेस अध्यक्ष बनना उनके साथ साथ पूरी पार्टी के लिए एक नई शुरुआत की तरह है। बेशक भाजपा खरगे को सोनिया गांधी की कठपुतली की तरह प्रचारित करे, पर अध्यक्ष पद के नामांकन के बाद अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में खरगे ने ये साफ कर दिया था कि वो गांधी परिवार का सम्मान हमेशा करेंगे, मार्गदर्शन भी लेंगे लेकिन पांच दशकों की राजनीति का उनका अपना अनुभव भी है और वो जरूरी फैसले लेने में खुद सक्षम हैं।
जिस तरह मोदी सरकार के आने के बाद से भाजपा और संघ से जुड़े लोगों ने लगातार कांग्रेस को परिवारवाद, वंशवाद के आरोपों से मढ़ दिया, गांधी परिवार पर तमाम तरह की टिप्पणियां कीं, राहुल गांधी पर तंज कसे और सोशल मीडिया के अपने जबरदस्त नेटवर्क के जरिये उनका मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में लगातार कमजोर होती कांग्रेस के लिए भाजपा के इस हमले से बचना पहली चुनौती साबित हो रही थी। इस चुनाव के जरिये पार्टी ने ये साबित करने में भी कामयाबी पाई कि उनके यहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होता है, शशि थरूर का चुनाव लड़ना, अंतिम वक्त तक मैदान में बने रहना और बहुत ही संजीदा तरीके से 1000 से ज्यादा वोट हासिल करना इसका सबूत है। ये तो तय माना जा रहा था कि खरगे आलाकमान की पसंद हैं, पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार हैं तो उन्हें जीतना ही है, लेकिन मैदान में थरूर की मजबूत उपस्थिति और पार्टी को नई दिशा देने, मजबूत करने से जुड़े उनके कैंपेन ने भी कांग्रेस की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूती दी।
खरगे से जुड़े सूत्र बताते हैं कि 80 साल के मल्लिकार्जुन खरगे सबसे पहले अपनी ही पार्टी के भीतर के असंतुष्टों के साथ मिल बैठकर उनकी बातें सुनने समझने की कोशिश करेंगे। अध्यक्ष चुने जाने के बाद उनके प्रतिद्वंदी शशि थरूर ने उनके घर जाकर उनसे मुलाकात की और शुभकामनाएं दीं। थरूर ने खरगे की खूब तारीफ की और पार्टी को मजबूत करने में उनका साथ देने का भरोसा दिलाया। बेशक खरगे के लिए थरूर और उनके समर्थकों के साथ मिलना, उनकी बातें सुनना, पार्टी की कार्यशली से उनके असंतोष की वजहें समझना प्राथमिकता तो है ही, साथ ही उनकी कोशिश ये भी होगी की जो लोग भी कांग्रेस से नाराज़ होकर पार्टी छोड़कर चले गए हैं, उन्हें वापस कैसे लाया जाए। अध्यक्ष पद पर खरगे की ताजपोशी 26 अक्तूबर को होगी, लेकिन पिछले एक महीने से देशभर में लगातार दौरे करते हुए उन्होंने ये समझने की पूरी कोशिश की है कि आखिर पार्टी की मर्ज़ क्या है और उसकी दवा कैसे की जाए।
हिमाचल और गुजरात के चुनाव में अगर पार्टी 2017 के चुनावों से कुछ बेहतर प्रदर्शन कर ले जाती है तो खरगे अपनी पहली अग्निपरीक्षा में पास हो जाएंगे। गुजरात में पिछली बार कांग्रेस को 80 सीटें मिली थीं और भाजपा ने 99 सीटों के साथ बहुमत पाया था। वहीं हिमाचल की 68 सीटों में से कांग्रेस को पिछली बार महज 21 सीटें ही मिल पाई थीं जबकि भाजपा ने 44 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। खरगे ने इसे लेकर होमवर्क पिछले एक महीने से शुरु कर दिया था और इस बार टिकटों के बंटवारे में खरगे की राय को भी अहम माना गया है। जाहिर है अध्यक्ष पद चुनाव की भागदौड़ के बीच खरगे ने ये रणनीति बनानी शुरु कर दी थी कि उन्हें बतौर अध्यक्ष क्या क्या करना है। अब फिलहाल 26 को पार्टी अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद उन्हें हिमाचल का दौरा करना है, फिर गुजरात का। माना जा रहा है कि उनके साथ राजीव शुक्ला भी होंगे। राहुल गांधी के साथ भी खरगे कुछ रैलियों में जाएंगे।
इन तमाम कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार हो रही है लेकिन सबसे अहम जो सवाल हैं वो यही कि क्या खरगे के आने के बाद से कांग्रेस का चेहरा बदलेगा? पार्टी के भीतर जो निराशा और हताशा का आलम है, वो कैसे दूर होगा और राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद जो एक नया जोश नजर आ रहा है, उसे खरगे कैसे अपनी ताकत के रूप में तब्दील कर पाएंगे?
खरगे और कांग्रेस की मुख्य चुनौती भाजपा और संघ परिवार की विचारधारा से लड़ना है, 2024 में भाजपा को सत्ता से उखाड़ना है और जाहिर है इसके लिए उससे पहले होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी की हालत सुधारना है। खरगे ये कैसे कर पाएंगे और किस तरह पार्टी संगठन को मजबूत करके उसका जनाधार बढ़ा पाएंगे, साथ ही कैसे खुद पर लगाए जा रहे रबर स्टैंप का ठप्पा हटाकर अपनी स्वतंत्र और मजबूत हैसियत साबित कर पाएंगे, सबसे बड़ी चुनौती यही है।







