अयोध्या भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति में अयोध्या जिले के 12 नेताओं को जगह मिलने के बाद संगठन के भीतर असंतोष और उपेक्षा की चर्चा तेज हो गई है। सवाल सिर्फ नियुक्तियों का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का है, जिसमें दशकों तक संगठन की नींव मजबूत करने वाले कार्यकर्ता खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। आरोप है कि चार दशक की निष्ठा पर सियासी रसूख, गुटीय समीकरण और प्रभावशाली नेताओं की पैरवी भारी पड़ रही है।अनिल तिवारी, लल्लू सिंह, ऋषिकेश उपाध्याय, रामू प्रियदर्शी और रघुनंदन चौरसिया जैसे नेताओं का संगठनात्मक अनुभव लंबा रहा है। संजीव सिंह भी लगातार दो बार जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। गोरखनाथ बाबा भाजपा और खब्बू तिवारी गठबंधन से पूर्व विधायक रह चुके हैं।इसके बावजूद प्रदेश कार्यसमिति में चयन को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या संगठन में लंबे समय तक काम करने का अनुभव अब पर्याप्त नहीं रह गया है?विपनेश पांडेय और रविंद्र पटेल को मिली जगह भी चर्चा के केंद्र में है। भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं का आरोप है कि मंडल और जिला स्तर पर संगठनात्मक सक्रियता का लंबा रिकॉर्ड रखने वाले नेताओं की अनदेखी कर अपेक्षाकृत नए चेहरों को प्रदेश स्तर पर तरजीह दी गई। विपनेश पांडे की नियुक्ति को कुछ लोग महापौर गिरीश पति त्रिपाठी के राजनीतिक प्रभाव से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं, एकसमय राष्ट्रीय लोकदल में मुन्ना सिंह चौहान के खास माने जाने वाले से लोकदल छोड़कर भाजपा की नाव पर सवार हुए सुनील तिवारी शास्त्री की नियुक्ति के पीछे प्रदेश महामंत्री एवं कार्यालय प्रभारी गोविंद नारायण शुक्ला की भूमिका की चर्चा है। लगभग एक दशक से भाजपा में सक्रिय सुनील तिवारी की नियुक्ति पर भाजपा में बड़ा रार ठन गया है।करुणाकर पांडे की नियुक्ति ने भी संगठन के भीतर बहस को हवा दी है। लगभग 2 साल पहले वह बसपा छोड़कर भाजपा में आए थे। बसपा में रहते हुए वह कार्यवाहक जिला पंचायत अध्यक्ष की भूमिका निभा चुके हैं। उनकी नियुक्ति को बसपा में प्रभावशाली नेता रहे वर्तमान में भाजपा से उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक की पैरवी से जोड़कर देख रहे हैं।भाजपा के एक महामंत्री के मुताबिक, ओमप्रकाश सिंह, कमला शंकर पांडे, बांके बिहारी मणि त्रिपाठी और अभिषेक मिश्रा जैसे नेताओं ने तीन से चार दशक तक संगठन के लिए काम किया है। इसके बावजूद उन्हें प्रदेश कार्यसमिति में जगह नहीं मिलने से पुराने कार्यकर्ताओं में निराशा है।अब सवाल है कि क्या भाजपा में संगठन के प्रति समर्पण से ज्यादा नेताओं की नजदीकी और गुटीय समीकरण मायने रखने लगे हैं? क्या पुराने कार्यकर्ता केवल चुनावी मेहनत और भीड़ जुटाने तक सीमित रहेंगे? प्रदेश कार्यसमिति के गठन ने अयोध्या भाजपा में सम्मान, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक तरजीह की लड़ाई को उजागर कर दिया है। यही असंतोष आगे चलकर संगठन के लिए चुनौती बन सकता है।








