कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपना हमला और तेज कर दिया है। पार्टी के महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने सोमवार को कहा कि ज्ञानेश कुमार को अब तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। रमेश का आरोप है कि ‘जी-2 के गैर-कानूनी आदेशों को लागू करने’ की उनकी क्षमता ने उन्हें अब ‘देश के लिए बोझ’ बना दिया है। कांग्रेस का यह बयान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की उस टिप्पणी के एक दिन बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके कारण लाखों भारतीय नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित होना पड़े,’पूरी तरह मनमानी’ होगी और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ होगी।
कांग्रेस इससे पहले भी न्यायमूर्ति भुइयां की टिप्पणी के आधार पर चुनाव आयोग पर सवाल उठा चुकी है। रविवार को पार्टी ने कहा था कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की टिप्पणी से यह साबित होता है कि सीईसी ने संविधान के अक्षर और उसकी मूल भावना, दोनों का उल्लंघन किया है। जयराम रमेश ने रविवार शाम कहा था कि उच्चतम न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां पर्यावरण संरक्षण के मुखर समर्थक रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब इस ‘साहसी कानूनविद’ ने मजबूती से अपनी राय रखी है कि वोट देने का अधिकार संविधान के मूल ढांचे का अहम हिस्सा है। रमेश ने दावा किया कि न्यायमूर्ति भुइयां की टिप्पणी साफ तौर पर दिखाती है कि संवैधानिक पद पर बैठे सीईसी ने संविधान की भावना का उल्लंघन किया है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायमूर्ति भुइयां ने इससे भी आगे जाकर कई बातें कही हैं और सीईसी की ‘पूरी तरह पोल खोल दी है।’ कांग्रेस नेता के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार अब अपने पद पर बने रहने का “सारा नैतिक अधिकार” खो चुके हैं।
कांग्रेस का यह हमला ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की उस रिपोर्ट के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान “विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया” से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों का कहना था कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या उनकी सिफारिश के बिना लिए गए थे। इससे चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं।
‘अलग राय होना सामान्य बात’
अपने ही दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को लेकर सवालों के घेरे में आए चुनाव आयोग ने कहा है कि किसी भी संस्था में अलग-अलग राय होना और फैसलों पर विचार-विमर्श होना सामान्य बात है। आयोग का कहना है कि उसके सभी आदेशों को पूरी कानूनी मान्यता हासिल है और उन्हें स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत ही जारी किया जाता है। यानी आयोग ने साफ किया है कि अंदरूनी मतभेद या अलग राय को फैसलों की वैधता पर सवाल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति भुइयां ने वोट के अधिकार पर क्या कहा था?
हैदराबाद स्थित नालसार विधि विश्वविद्यालय में 19वीं न्यायमूर्ति बोध राज साहनी स्मृति वाद-विवाद प्रतियोगिता के समापन समारोह में भाषण देते हुए न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने वोट देने के अधिकार को लेकर अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों के दो अलग-अलग वर्गों की कल्पना नहीं करता—एक ऐसा वर्ग जिसे वोट देने का अधिकार हो और दूसरा ऐसा वर्ग जिसे यह अधिकार हासिल न हो। न्यायमूर्ति भुइयां के मुताबिक, अगर किसी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में बिना मतदान अधिकार वाले नागरिक बन जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगी।
‘लाखों लोग वोट से वंचित हुए तो यह मनमानी होगी’
न्यायमूर्ति भुइयां ने बेहद साफ शब्दों में कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के नतीजे में लाखों या करोड़ों भारतीय नागरिक अपने वोट देने के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक जैसी स्थिति में पहुंच जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी होगी। इसे किसी दूसरे मुद्दे का उदाहरण देकर या ‘दूसरे मामलों का हवाला देकर बचाव’ के जरिए सही नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक, ऐसी स्थिति संविधान की मूल भावना पर सीधा हमला होगी और यह उस संवैधानिक व्यवस्था को नकारने जैसा होगा, जिसे भारत ने संविधान के आधार पर अपनाया है।
‘कोई भी संविधान से ऊपर नहीं’
न्यायमूर्ति भुइयां ने यह भी कहा कि भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार विदेशी शासन के खिलाफ देश के लंबे संघर्ष से जुड़ा हुआ है। यह अधिकार लंबे संघर्ष और बलिदान के बाद मिली आजादी का प्रतीक है। इसलिए अनुच्छेद 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। कोई भी प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता और न ही कोई अदालत इसका समर्थन या इसे मंजूरी दे सकती है। उनके शब्दों में, “कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है।”
वोट का अधिकार सिर्फ कानून से मिला अधिकार नहीं
न्यायमूर्ति भुइयां ने अपने भाषण में एक और अहम बात कही। उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार या मतदाता बनने का अधिकार महज ऐसा कानूनी अधिकार नहीं है, जो संसद के बनाए किसी कानून, जैसे ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’, से मिलता हो। यह एक संवैधानिक अधिकार है और लोकतंत्र का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी वजह से यह भारतीय संविधान के “मूल ढांचे” के दायरे में आता है।
न्यायमूर्ति भुइयां ने उच्चतम न्यायालय के एक आदेश का जिक्र करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही यह मान चुकी है कि किसी नागरिक के वोट देने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 326 में दिए गए प्रावधानों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनकी इन टिप्पणियों को कांग्रेस ने चुनाव आयोग और खास तौर पर सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने आरोपों के समर्थन के तौर पर पेश किया है। वहीं, चुनाव आयोग लगातार यह कह रहा है कि उसके फैसले कानूनी प्रक्रिया और अधिकारों के दायरे में लिए जाते हैं।





