24 सितंबर 2002 को गांधीनगर में स्वामी नारायण अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिला दिया था। एनएसजी कमांडो के ऑपरेशन वज्र शक्ति ने भक्तों की भारी भीड़ तो बचा ली मगर तीन जवानों समेत 33 लोगों की मौत न टाल पाई।
पाकिस्तान समर्थित लश्कर-ए-ताइबा के फिदायीन मुर्तजा हाफिज यासीन व अशरफ अली मोहम्मद फारूक मौके पर ढेर हो गए। गुजरात क्राइम ब्रांच और जम्मू पुलिस की लंबी धरपकड़ प्रक्रिया के बाद पोटा कोर्ट ने 34 आरोपियों में मुख्य साजिशकर्ता बताकर चांद खां, अब्दुल कयूम और आदम अजमेरी को फांसी की सजा सुनाई।
चांद खान के घर से नजदीक कांकर टोला पुलिस चौकी के सामने गली में मुस्लिम ढाबा चलाने वाले शरीफ और मुनीर अक्षरधाम कांड में बरी हुए चांद खान का नाम पूछने पर ठिठक गए। बोले- कभी सुना ही नहीं। ढाबे में खाना खा रहे बुजुर्ग बोले-अक्षरधाम कांड तो बहुत पुराना है, मगर बगल की गली में रहने वाले चांद को पहचानने से वह भी मुकर गए। बातों में दिलचस्पी ले रहे कपड़े की दुकान चलाने वाले बुजुर्ग चांद खान के नाम पर चहके तो मगर पता पूछने पर असहज होकर बोले- हमसे ज्यादा जानकार और बड़े लोग यहां हैं, उनसे ही पूछ लो भाई..।






