उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। वन्यजीवों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। हाल के आंकड़ों के अनुसार राज्य में भालुओं की संख्या करीब 3,200 है, जो सबसे अधिक है। इसके बाद तेंदुओं की संख्या 2,276, हाथियों की संख्या 2,026 और बाघों की अनुमानित संख्या 560 है। इनमें 260 बाघ कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में पाए जाते हैं।
25 साल में 954 मौतें, तेंदुए सबसे घातक
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 से 2025 तक 25 वर्षों में मानव–वन्यजीव संघर्ष की वजह से उत्तराखंड में लगभग 954 लोगों की मृत्यु हुई। यह औसतन लगभग 30 मौतें प्रतिवर्ष है। हाल के वर्षों में मानव मृत्यु की संख्या में वृद्धि की प्रवृत्ति देखी गई है। इस अवधि में सबसे अधिक 548 मौतें तेंदुओं के हमलों से हुईं। इसके बाद हाथियों के हमलों से 230 और बाघों के हमलों से 106 लोगों की मृत्यु हुई। भालुओं के हमलों से 70 लोगों की जान गई। घायलों की संख्या भी चिंता बढ़ाने वाली है। 2000 से 2025 के बीच तेंदुए के हमलों से सबसे अधिक 2,127 लोग घायल हुए। इसके बाद भालू के हमलों से 2,013, हाथियों के हमलों से 234 और बाघों के हमलों से 130 लोग घायल हुए।
वर्ष 2020 से 2025 के बीच मानव–वन्यजीव संघर्ष के कारण कुल 438 लोगों की मृत्यु और 2335 लोग घायल हुए। इस अवधि में सबसे अधिक 84 मौतें वर्ष 2024 में हुईं, जबकि 2022 में 82 मौतें दर्ज की गईं। घायलों की संख्या के मामले में भी 2024 सबसे आगे रहा, जब 512 लोग घायल हुए। इसके बाद 2025 में 488 लोग घायल हुए। 2000–2025 की दीर्घकालिक अवधि और 2020-2025 की हाल की छह वर्षीय अवधि की तुलना से पता चलता है कि बाद की अवधि में मृत्यु और चोटों की दर असंगत रूप से अधिक रही है, जबकि यह कुल अध्ययन अवधि का केवल लगभग एक-चौथाई हिस्सा है। मानव–वन्यजीव संघर्ष के हॉटस्पॉट में पौड़ी जिले में मानव मृत्यु की संख्या सबसे अधिक 53 रही। इसके बाद अल्मोड़ा में 47 और टिहरी में 36 लोगों की मृत्यु हुई। चमोली और नैनीताल जिलों में भी 30-30 लोगों की मृत्यु हुई। वहीं बागेश्वर, ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और चंपावत जिलों में वन्यजीवों के कारण मानव मृत्यु की संख्या 20 से कम रही।






