अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त आर्थिक कार्रवाई की धमकी दी। उन्होंने कहा कि ईरान को अमेरिका के साथ समझौता करने का सबसे बड़ा मौका दिया गया था। लेकिन उसने इसे गंवा दिया।
ट्रंप ने कहा कि जो भी देश ईरान को किसी भी तरह की आर्थिक मदद देगा, उसे भी बड़े आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ेगा। इसमें वित्तीय संस्थान, कारोबार, हवाई अड्डे और सरकारी संस्थाएं शामिल हैं।
उन्होंने तेल की तस्करी, स्वैप लाइन, नकद लेनदेन, एक्सचेंज हाउस, जहाजों के पंजीकरण और ईरान की मदद करने वाली छिपी हुई (शेल) कंपनियों को तुरंत रोकने की बात कही।
सहयोगी देशों से अमेरिका के साथ आने की अपील
ट्रंप ने इसे ईरान के खिलाफ बड़े आर्थिक हमले का दिन बताया। उन्होंने अमेरिका के सहयोगी देशों से ईरान को अलग-थलग करने और उसके खतरे को खत्म करने में साथ देने की अपील की।
उन्होंने कहा कि ईरान इस समय बेहद कमजोर स्थिति में है। उन्होंने दावा किया कि ये ऐतिहासिक कदम ईरान को और दुनियाभर में आतंक फैलाने की उसकी क्षमता को बुरी तरह कमजोर कर देंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, ईरान के पास कभी परमाणु हथियार नहीं होगा।
अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाया
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के पिछले हफ्ते इसी तरह बयान दिया था। बेसेंट ने कहा था कि अमेरिका ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिशें बढ़ाएगा। इस रणनीति में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी भी शामिल है।
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी’ नाम से प्रतिबंध अभियान भी चला रहा है। इसका मकसद लक्षित कार्रवाई के जरिये ईरान के पैसे जुटाने के स्रोतों को बंद करना है।
ईरान के खिलाफ युद्ध कब शुरू हुआ?
युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इस्राइल के हमलों के साथ हुई। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए।
कौन-कौन से देश ईरान के साथ?
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस ने ईरान को सैन्य उपकरण और ड्रोन से जुड़ी तकनीक दी है। वहीं, चीन लगातार ईरान से तेल खरीद रहा है। चीन ने ईरान के साथ कारोबारी रिश्ते बनाए रखे हैं और उसे कूटनीतिक समर्थन भी दिया है। पाकिस्तान ने कूटनीति और बातचीत शुरू कराने की कोशिशों के जरिये ईरान का समर्थन किया है। हालांकि, उसने ईरान को सैन्य मदद नहीं दी है।
रॉयटर्स के मुताबिक, ईरान को उसके सहयोगी हथियारबंद समूहों का भी समर्थन हासिल है। इनमें यमन के हूती और इराक में ईरान के साथ जुड़े लड़ाके शामिल हैं। ट्रंप ने इससे पहले कहा था कि अमेरिका के पास ईरान के खिलाफ ‘बहुत कड़े प्रतिबंध’ लगाने के विकल्प मौजूद हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ट्रंप ने दावा किया, अभी जलडमरूमध्य खुला है। बहुत सारी नावें वहां से गुजर रही हैं।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत पर इसका असर तेल और गैस की कीमतों, नौवहन और महंगाई के रूप में पड़ सकता है, क्योंकि होर्मुज में तनाव बढ़ने से भारत की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। साथ ही ईरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ने से भारत के चाबहार बंदरगाह से जुड़ी योजनाओं पर भी असर पड़ने का खतरा है। चाबहार भारत के लिए ईरान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का अहम रास्ता है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंध और मौजूदा संघर्ष पहले ही इसके कामकाज पर दबाव डाल रहे हैं।






