प्रधानमंत्री मोदी की पोस्ट फेसबुक से हटाने और प्लेटफॉर्म में कई खामियों को लेकर भारत सरकार के कड़े रुख के बाद मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग ने माफी मांगी है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव और आईटी सचिव एस. कृष्णन से मुलाकात के दौरान मेटा की ग्लोबल टीम ने बाल शोषण सामग्री (सीएसएएम), डीपफेक कंटेंट और प्लेटफॉर्म संचालन में हुई गलतियों पर खेद जताया है।
क्या मेटा को नहीं मिलेगा आईटी एक्ट का फायदा?
सरकारी सूत्रों के अनुसार, मेटा की ग्लोबल अफेयर्स ऑफिसर जोएल काप्ला समेत उच्चस्तरीय टीम को स्पष्ट कर दिया गया है कि वे ‘इंटरमीडियरी’ (मध्यस्थ) की परिभाषा में नहीं आते हैं। चूंकि प्लेटफॉर्म यह तय करता है कि उपयोगकर्ता को कौन सा कंटेंट दिखेगा, इसलिए आईटी अधिनियम के तहत मिलने वाला ‘सेफ हार्बर’ (कानूनी सुरक्षा कवच) उन पर लागू नहीं होता। सरकार ने साफ किया है कि यह केवल एक तकनीकी चूक का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा गंभीर मामला है।
बाल शोषण और डीपफेक पर घिरी कंपनी
इंस्टाग्राम पर विज्ञापनों में बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार डीपफेक सामग्री को लेकर भी मेटा जांच के दायरे में है। आईटी सचिव एस. कृष्णन ने कहा कि इतनी बड़ी वैश्विक टेक कंपनी होने के नाते मेटा के पास इन समस्याओं को रोकने के लिए पुख्ता तकनीक होनी चाहिए। सरकार ने एल्गोरिदम में पक्षपात और प्रमुख हस्तियों के खातों की सुरक्षा को लेकर सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
पीएम मोदी का वीडियो हटाने पर संसदीय समिति ने क्या कहा था?
इस मामले में संसद की संचार और सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति ने मेटा से कड़ी नाराजगी जताई थी। समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने कहा था कि यदि यह तकनीकी गलती थी तो यह बेहद गंभीर है और यदि जानबूझकर किया गया तो यह प्रधानमंत्री की छवि खराब करने का प्रयास माना जाएगा। उन्होंने कहा था कि मार्क जुकरबर्ग को व्यक्तिगत रूप से माफी मांगनी चाहिए। साथ ही चेतावनी दी थी कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो मेटा का ‘सेफ हार्बर’ संरक्षण वापस लेने की सिफारिश की जा सकती है।
संसदीय समिति ने सोशल मीडिया कंपनियों से क्या सवाल पूछे?
समिति की बैठक में मेटा के अलावा एक्स, गूगल और यूट्यूब सहित कई सोशल मीडिया कंपनियों के वरिष्ठ प्रतिनिधि मौजूद थे। सांसदों ने एल्गोरिदम की पारदर्शिता, बाल यौन शोषण सामग्री, डीपफेक, साइबर ठगी, महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन उत्पीड़न और गैरकानूनी सामग्री पर भी सवाल उठाए। समिति का कहना था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपने नियमों का सख्ती से पालन करना चाहिए और आपत्तिजनक सामग्री पर समयबद्ध कार्रवाई करनी चाहिए।








