जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन के बीच आखिरकार शनिवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे के फैसले के कई मायने निकाले जा रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर विश्लेषकों का मानना है कि सरकार को अब विपक्ष और छात्रों को एकसाथ बैठाकर भविष्य की रूपरेखा को अंतिम रूप देना होगा। पढ़ें…
राकेश शुक्ल: ऐसा नहीं कहा जा सकता। चिंता और क्षमा तब मानी जाती, जब त्याग-पत्र स्व-प्रेरित होता। अगर पहले इस्तीफा हो जाता, तो धर्मेंद्र प्रधान दोषमुक्त कहलाते। प्रधान आज बलिदानी नहीं माने जाएंगे, भले ही उनके खिलाफ कुछ भी प्रपोगैंडा चला हो। सवाल यह है कि क्या ऐसा कोई तंत्र हमारे पास है, जिससे भविष्य में कोई भी पेपर लीक ही न हो। किसी भी तरह की परीक्षा हो, बच्चे उसमें मेहनत करते हैं, तैयारी करते हैं। पेपर लीक होता है तो मनोबल धराशायी हो जाता है। यह माना जा सकता है कि यह बड़ी पहल सरकार की तरफ हुई है। दूसरी पहल यह है कि सरकार कानून को और सख्त बनाने जा रही है, लेकिन जब तक आप यह प्रबंध नहीं करेंगे कि पेपर लीक हो ही नहीं और जब तक यह प्रबंध नहीं होगा कि कानून का भय रहे, तब तक सख्त सजा के प्रावधानों के मायने नहीं होंगे।
सरकार के लिए सबक क्या हैं?
राकेश शुक्ल: सरकार को अब विपक्ष और छात्रों को एकसाथ बैठाकर भविष्य की रूपरेखा को अंतिम रूप देना होगा। संदेह के दायरे में तो यूपीएससी भी आ जाता है। जो सक्षम हैं, वो भी विकलांगता सर्टिफिकेट बनवाकर देश में नौकरियां पा जाते हैं। यह पूरा मुद्दा राज्यों के आगामी चुनाव का नहीं है। सरकार को समझना होगा कि यह आंदोलन सिर्फ जंतर-मंतर का नहीं है। बच्चों के अलावा अभिभावक भी मानसिक रूप से आंदोलन में शामिल हैं। जो देश प्रधानमंत्री मोदी पर आंख बंद कर भरोसा करता था, उस भरोसे में संदेह की स्थिति पैदा हुई, इसीलिए शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ। आंदोलन तो किसानों ने भी किया था, शाहीन बाग में भी आंदोलन हुआ, तब इस्तीफे नहीं हुए। यह छात्र आंदोलन है। युवाओं में नाराजगी है। इसलिए सरकार को समझना पड़ा कि प्रधान के इस्तीफे की वाकई जरूरत थी।
सुनील शुक्ल: इस इस्तीफ को विपक्षी दल और आंदोलनकारी इस रूप में लेंगे कि सरकार ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है। धर्मेंद्र प्रधान की चिट्ठी को ही देखिए। उस पूरी चिट्ठी में कहीं भी क्षमा-याचना का उल्लेख नहीं है। इस सरकार का सबसे बड़ा नैरेटिव यह था कि यह आरोपों पर इस्तीफा देने वाली सरकार नहीं है। यह कहा गया कि एनडीए की सरकार में इस्तीफे नहीं होते। यह राजनीतिक नैरेटिव ध्वस्त हो गया। यह डैमेज कंट्रोल नहीं है। इस्तीफा स्वागत योग्य है। अगर बांध के रिसाव की समय पर मरम्मत न हो, तो बांध टूटने से नहीं रोका जा सकता। इस्तीफा देर से आया। सरकार ने यह निर्णय विलंब से किया। एक इस्तीफे से यह मामला रुकेगा नहीं। सरकार पर इसका राजनीतिक असर पड़ेगा। विपक्षी दल तो इससे भी आगे की बात कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर माफी मांगें। प्रधान के इस्तीफे से मामला यहीं खत्म हो जाएगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता।
क्या लोक-लाज में इस्तीफा हुआ?
विनोद अग्निहोत्री: हां। देर आयद, दुरुस्त आयद। इस सरकार में यह लोक लाज का पहला उदाहरण है कि जनता के दबाव में ही सही और विपक्ष के दबाव में ही सही, सरकार ने इस मुद्दे को माना और प्रधान का इस्तीफा हुआ। अगर किसान आंदोलन के दबाव में कानून वापस हुए थे, तो वो भी स्वागत योग्य है। यह सरकार की हार नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जीत है। अब ऐसा समाधान निकले की फुलप्रूफ व्यवस्था बने। सरकार को विशेषज्ञ समिति बनानी चाहिए और उसकी सिफारिशों पर काम करना चाहिए। सरकार और विपक्ष इसे अब नाक का सवाल न बनाए। जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करना जरूरी होता है। सरकार ने इस बात को माना। बात सिर्फ नीट परीक्षा की नहीं है। पहले भी ऐसे मामले हुए। सरकार पहले मना करती रही, फिर स्वीकार करती रही। देशभर में एक लाख से ज्यादा सरकारी स्कूल बंद हो गए। ये सब भी बड़े मुद्दे हैं।





