लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पैलेट गन को लेकर सरकार पर तीखा हमला किया है। उन्होंने एक प्रदर्शनकारी को मीडिया के सामने पेश किया, जिसके शरीर पर छर्रे लगने का दावा किया गया। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है।
क्या पैलेट गन चलाने वाले जवानों को ट्रेनिंग भी दी जाती है?
सरकार के अनुसार, कम घातक हथियारों और गोला-बारूद के इस्तेमाल के लिए सुरक्षाकर्मियों को तीन दिन की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। इसमें दंगा नियंत्रण की थ्योरी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के साथ हथियारों और उपकरणों के इस्तेमाल की जानकारी दी जाती है। इसके अलावा कानून-व्यवस्था से जुड़ी परिस्थितियों से निपटने और कम घातक हथियारों से फायरिंग का अभ्यास भी कराया जाता है।
इंसानी शरीर पर पैलेट के असर की जांच कैसे होती है?
पैलेट गन और लेड आधारित छर्रों के असर का परीक्षण चंडीगढ़ स्थित टीबीआरएल में किया गया था। इसके लिए बैलिस्टिक ग्रेड के पारदर्शी जिलेटिन ब्लॉक का इस्तेमाल किया गया। इन ब्लॉक को इस तरह तैयार किया जाता है कि गोली या छर्रा लगने पर इनकी प्रतिक्रिया कुछ मामलों में इंसानी शरीर के ऊतकों जैसी हो। इनमें लचीलापन, ऊर्जा सोखने की क्षमता और मजबूती जैसे पहलुओं को देखा जाता है। हालांकि, पैलेट की खरीद, उनके परीक्षण और चयन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों व इन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाली धातु से जुड़ी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। सरकार ने इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया।
अब जानें, भीड़ को हटाने के लिए कानून क्या कहता है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 148 में गैरकानूनी भीड़ को हटाने के लिए बल के इस्तेमाल का प्रावधान है। इसके मुताबिक कोई कार्यकारी मजिस्ट्रेट, पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी या उसकी गैरमौजूदगी में कम से कम सब-इंस्पेक्टर रैंक का पुलिस अधिकारी किसी गैरकानूनी भीड़ को वहां से हटने का आदेश दे सकता है। यह नियम पांच या उससे ज्यादा लोगों की ऐसी भीड़ पर भी लागू होता है, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो।
अगर आदेश दिए जाने के बावजूद भीड़ नहीं हटती या उसके व्यवहार से लगता है कि वह हटने के लिए तैयार नहीं है, तो उसे बल प्रयोग करके हटाया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर भीड़ में शामिल लोगों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है।
सशस्त्र बलों को कब बुलाया जा सकता है?
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 149 में सशस्त्र बलों की मदद से भीड़ को हटाने की व्यवस्था है। अगर धारा 148 के तहत किसी भीड़ को दूसरे तरीकों से हटाना संभव नहीं हो और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए उसे हटाना जरूरी हो, तो जिला मजिस्ट्रेट या उसकी ओर से अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों की मदद ले सकता है।
मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों के अधिकारी को भीड़ हटाने और जरूरत के मुताबिक लोगों को गिरफ्तार करने के लिए कह सकता है। हालांकि, कानून में यह भी साफ किया गया है कि ऐसा करते समय जितना संभव हो उतना कम बल इस्तेमाल किया जाए और लोगों तथा संपत्ति को कम से कम नुकसान पहुंचे।
भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस के पास और क्या विकल्प हैं?
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2017 में राज्यसभा में बताया था कि पुलिस राज्य का विषय है। इसलिए पुलिसकर्मियों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है।
हालांकि, केंद्र सरकार पुलिस बलों को आधुनिक बनाने की योजना के तहत राज्यों को कई तरह के सुरक्षा और दंगारोधी उपकरण खरीदने के लिए सहायता देती है। इनमें दंगारोधी उपकरण, फुल बॉडी प्रोटेक्टर, बुलेट रेजिस्टेंट जैकेट और हेलमेट, टियर गैस, पीएवीए शेल और चिली वाटर कैनन शामिल हैं। इसी तरह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को भी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने के लिए सहायता दी जाती है। जवानों को ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए ट्रेनिंग और नियमित मॉक ड्रिल भी कराई जाती है।





