पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई अब चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंच गई है। तृणमूल कांग्रेस पर असली अधिकार किसका है, इसे लेकर जारी टकराव में चुनाव आयोग ने गुरुवार को ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी, दोनों गुटों को नोटिस जारी कर 6 जुलाई, सोमवार शाम साढ़े पांच बजे तक अपना पक्ष और उससे जुड़े सभी दस्तावेज जमा करने को कहा है। राजनीतिक जानकार इसे केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस कानूनी लड़ाई की शुरुआत मान रहे हैं, जिसके नतीजे असर पार्टी के संगठन, चुनाव चिह्न, वित्तीय नियंत्रण और भविष्य की राजनीति पर पड़ सकता है।
सोमवार क्यों है अहम 6 जुलाई की समयसीमा केवल जवाब देने की अंतिम तारीख नहीं है। आयोग को दोनों पक्षों की ओर से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय करनी है। यदि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त हुई तो जांच तेज हो सकती है, जबकि विवाद गहराने की स्थिति में विस्तृत सुनवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आयोग आगे चलकर अतिरिक्त दस्तावेज भी मांग सकता है।
चुनाव चिह्न और पार्टी फंड पर भी पड़ सकता है असर तृणमूल के भीतर बढ़ते विवाद का असर संगठन की वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच चुका है। पार्टी के बैंक खातों को लेकर विवाद पहले ही सामने आ चुका है। ऐसे में आयोग का अंतिम फैसला केवल संगठनात्मक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पार्टी की संपत्तियों, वित्तीय नियंत्रण और चुनावी पहचान पर भी दूरगामी असर डाल सकता है। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि आयोग को लगे कि दोनों गुटों के दावे प्रथम दृष्टया मजबूत हैं और तत्काल अंतिम निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है, तो परिस्थितियों के अनुसार चुनाव चिह्न को लेकर अंतरिम व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि ऐसा निर्णय पूरी तरह मामले के तथ्यों, प्रस्तुत दस्तावेजों और आयोग की संतुष्टि पर निर्भर करेगा।
आगे क्या हो सकता है सोमवार के बाद चुनाव आयोग की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है। पहले दोनों पक्षों के दस्तावेजों की जांच होगी। आवश्यकता पड़ने पर अलग-अलग सुनवाई हो सकती है। इसके बाद आयोग संगठनात्मक और विधायी समर्थन का परीक्षण करेगा और उसी आधार पर आगे का फैसला करेगा। यदि मामला जटिल बना रहा तो अंतरिम व्यवस्था के विकल्पों पर भी विचार संभव है। इसलिए आने वाले कुछ दिन न केवल तृणमूल कांग्रेस, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।






