तृणमूल पर किसका अधिकार?: चुनाव आयोग के पाले में पहुंची दल की लड़ाई, सोमवार के जवाब से तय होगी आगे की दिशा

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श्चिम बंगाल की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई अब चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंच गई है। तृणमूल कांग्रेस पर असली अधिकार किसका है, इसे लेकर जारी टकराव में चुनाव आयोग ने गुरुवार को ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी, दोनों गुटों को नोटिस जारी कर 6 जुलाई, सोमवार शाम साढ़े पांच बजे तक अपना पक्ष और उससे जुड़े सभी दस्तावेज जमा करने को कहा है। राजनीतिक जानकार इसे केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस कानूनी लड़ाई की शुरुआत मान रहे हैं, जिसके नतीजे असर पार्टी के संगठन, चुनाव चिह्न, वित्तीय नियंत्रण और भविष्य की राजनीति पर पड़ सकता है।

गुरुवार को ऋतब्रत बनर्जी नौ विधायकों और एक पूर्व मंत्री के साथ नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग पहुंचे। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और पूर्ण आयोग से मुलाकात कर दावा किया कि तृणमूल के दो-तिहाई विधायक, कई पूर्व मंत्री, बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि और संगठन के पदाधिकारी उनके साथ हैं। उन्होंने आयोग को नई राष्ट्रीय कार्यसमिति की सूची सहित कई दस्तावेज भी सौंपे।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी पहले ही स्वयं को तृणमूल की राष्ट्रीय अध्यक्ष बताते हुए पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की सूची चुनाव आयोग को उपलब्ध करा चुकी हैं। दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी दावों के बाद आयोग ने पहली बार एक साथ दोनों गुटों से लिखित जवाब और उसके समर्थन में दस्तावेज मांगे हैं। सूत्रों के अनुसार आयोग ने दोनों पक्षों से स्पष्ट रूप से पूछा है कि पार्टी पर वैध अधिकार का उनका दावा किन आधारों पर टिका है। दोनों गुटों को अपने दावे के समर्थन में पार्टी संविधान, राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन, संगठनात्मक निर्णयों, निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन और अन्य संबंधित अभिलेख प्रस्तुत करने होंगे।
अब आयोग किन पहलुओं पर करेगा फैसला राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आयोग केवल विधायकों की संख्या के आधार पर निर्णय नहीं करेगा। पार्टी का संविधान, संगठनात्मक बहुमत, राष्ट्रीय कार्यसमिति की वैधता, निर्वाचित प्रतिनिधियों और संगठनात्मक पदाधिकारियों का समर्थन तथा दोनों पक्षों के दस्तावेजों की विश्वसनीयता, सभी पहलुओं की जांच की जाएगी। यदि दस्तावेजों में गंभीर विरोधाभास सामने आता है तो आयोग दोनों पक्षों को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए भी बुला सकता है।

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सोमवार क्यों है अहम 6 जुलाई की समयसीमा केवल जवाब देने की अंतिम तारीख नहीं है। आयोग को दोनों पक्षों की ओर से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय करनी है। यदि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त हुई तो जांच तेज हो सकती है, जबकि विवाद गहराने की स्थिति में विस्तृत सुनवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। आयोग आगे चलकर अतिरिक्त दस्तावेज भी मांग सकता है।

चुनाव चिह्न और पार्टी फंड पर भी पड़ सकता है असर तृणमूल के भीतर बढ़ते विवाद का असर संगठन की वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच चुका है। पार्टी के बैंक खातों को लेकर विवाद पहले ही सामने आ चुका है। ऐसे में आयोग का अंतिम फैसला केवल संगठनात्मक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पार्टी की संपत्तियों, वित्तीय नियंत्रण और चुनावी पहचान पर भी दूरगामी असर डाल सकता है। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि आयोग को लगे कि दोनों गुटों के दावे प्रथम दृष्टया मजबूत हैं और तत्काल अंतिम निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है, तो परिस्थितियों के अनुसार चुनाव चिह्न को लेकर अंतरिम व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि ऐसा निर्णय पूरी तरह मामले के तथ्यों, प्रस्तुत दस्तावेजों और आयोग की संतुष्टि पर निर्भर करेगा।

यहां तक कैसे पहुंचा विवाद विधानसभा चुनाव में तृणमूल की पराजय के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने लगे। पहले विधानसभा में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आए। इसके बाद संगठनात्मक नियंत्रण, राष्ट्रीय कार्यसमिति, पार्टी फंड और चुनावी अधिकारों को लेकर विवाद लगातार गहराता गया। ऋतब्रत गुट ने अलग राष्ट्रीय कार्यसमिति का गठन कर स्वयं को असली तृणमूल बताया, जबकि ममता बनर्जी गुट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए अपने संगठनात्मक अधिकार का दावा बनाए रखा।

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आगे क्या हो सकता है सोमवार के बाद चुनाव आयोग की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है। पहले दोनों पक्षों के दस्तावेजों की जांच होगी। आवश्यकता पड़ने पर अलग-अलग सुनवाई हो सकती है। इसके बाद आयोग संगठनात्मक और विधायी समर्थन का परीक्षण करेगा और उसी आधार पर आगे का फैसला करेगा। यदि मामला जटिल बना रहा तो अंतरिम व्यवस्था के विकल्पों पर भी विचार संभव है। इसलिए आने वाले कुछ दिन न केवल तृणमूल कांग्रेस, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।


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