राजधानी की भीड़, चमक और भागती जिंदगी के बीच राजिंदर नगर के एक पुराने घर में दो बुजुर्ग महिलाएं चुपचाप जिंदगी से हार गईं। आसपास करोड़ों के अपार्टमेंट्स खड़े थे, सड़क पर गाड़ियों का शोर था, लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे लेकिन उस घर के भीतर मौत आई और दोनों को लेकर चली गई लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी। घर की सफाई करने जब कामवाली पहुंची तो तेज बदबू से अनहोनी का अहसास हुआ। कमरे में 80 वर्षीय सरोज और उनकी भाभी चंद्रकांता मृत मिलीं। बुजुर्ग ननद-भाभी की मौत दो जिंदगियों का अंत नहीं बल्कि महानगरों में बढ़ती उस खामोशी की कहानी है, जहां लोग पास रहकर भी एक-दूसरे से दूर हो गए हैं।
20 करोड़ का घर और सरकारी पेंशन लेकिन खामोश जिंदगी
पड़ोसियों ने घर की कीमत करीब 20 करोड़ रुपये बताई है लेकिन इसके भीतर रहने वाली दोनों बुजुर्ग महिलाओं की दुनिया बेहद छोटी और खामोश थी। पड़ोस में रहने वाले 74 वर्षीय श्रीधर बताते हैं, कि सरोज से कभी-कभार दूध लेने जाते वक्त मुलाकात हो जाती थी। वो बहुत कम बोलती थीं। सरोज अविवाहित थीं और बिजली विभाग से सेवानिवृत्त थीं। उनके भाई भारतीय सेना में थे, जिनकी कोरोना काल में मृत्यु हो गई थी। भाई की पत्नी चंद्रकांता लंबे समय से बीमार थीं और घर से बाहर नहीं निकलती थीं। दोनों की कोई संतान भी नहीं थी।
परिवार में कोई नहीं बचा, पड़ोसी पता बनकर रह गए
सरोज की छोटी बहन भी थी जो विधवा और तलाकशुदा महिलाओं के लिए संस्था चलाती थीं, लेकिन बीमारी के चलते उनकी भी मौत हो चुकी है। अब घर में सिर्फ दो बुजुर्ग महिलाएं ही बची थीं, एक बीमार, दूसरी देखभाल करने वाली। नजदीक स्थित मदर डेयरी के दुकानदार को याद है कि महीने में एक-दो बार ही उन्हें दूध लेते देखा होगा।








