खिर्सू, जोगड़ी, ग्वाड़ और खेड़ाखाल जैसे गांवों से ग्रामीण शाम के समय जंगलों से काफल तोड़ते हैं और अगले दिन तड़के श्रीनगर बाजार में काफल की छोटी-छोटी टोकरी सज जाती हैं। खास बात यह है कि दोपहर होने से पहले अधिकांश काफल हाथों-हाथ बिक भी जाते हैं। ग्रामीणों के लिए काफल का सीजन अच्छी आमदनी का जरिया बन गया है। ग्वाड़ गांव से काफल बेचने आए हर्षलाल ने बताया कि इस बार काफल करीब 400 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। एक टोकरी में सात से आठ किलो तक काफल आ जाता है।
वहीं जोगड़ी के राहुल, रंजन और सौरभ ने बताया कि वे कांच के गिलास के हिसाब से 30 रुपये में काफल बेच रहे हैं। एक टोकरी से करीब दो हजार से 2200 रुपये तक की बिक्री हो जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि काफल बेचने के बाद वे श्रीनगर से घर का राशन और जरूरी सामान खरीदकर वापस गांव लौट जाते हैं।