वर्ष 1980 में पहला कुंभ देखा, उस समय प्रसिद्ध भूमा पीठाधीश्वर की सेवा में आया। जिम्मेदारी आश्रम के प्रबंधन की मिली। याद है कि पहले संतों के लिए उतना स्थान नहीं था, लेकिन सरकार जगह छावनी के लिए जगह देती थी। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु सीमित संसाधनों में काम करते थे।
रेत का टीला और मचान बनाकर संत अपने जीवन के तप योग और साधना का परिचय देते थे। प्रवचन, धर्म प्रचार और मेले में आए श्रद्धालुओं को धर्म से जोड़ते थे। इतनी भव्यता तो नहीं होती थी लेकिन आध्यात्म दिखता था। वर्ष 1986 के कुंभ मेले में बैरागी कैंप के बाहर करीब दो किलोमीटर दूर देवरहा बाबा का मचान लगता था। आज तो व्यापक क्षेत्र हो गया है। वर्तमान में संतों को कभी कहीं, तो कभी कहीं भूमि आवंटित किया जा रहा है। सबसे दुखद बात यह है कि जिन अखाड़ों और संतों को भूमि आवंटित की गई उन्होंने उस भूमि को संरक्षित नहीं किया।
बैरागी कैंप तो बहुत दूर की बात है। पहले अलग-अलग अखाड़ों को जो भूमि आवंटित की गई वह आज महलों में बदल गई। लोगों ने अप्रत्यक्ष रूप से बेंच खाया। इस पर न तो सरकारों ने ध्यान दिया और न ही संतों ने इसके संरक्षण की बात की। अगर इसी तरह से विकास के बहाने अवसंरचनाओं का विकास होता रहा तो आने वाले दिनों में दुर्व्यवस्था का सामना करना पड़ेगा।
सिंचाई विभाग उत्तर प्रदेश की अनदेखी और उत्तराखंड शासन की निष्क्रियता का परिणाम है कि मौजूदा समय में इस धर्मनगरी के स्वरूप को बर्बाद किया जा रहा है। अवैध तरीके के कारोबार उन जगहों पर हो रहे हैं, जिन जगहों पर कभी धर्म और आध्यात्म का बोलबाला था। शासन और प्रशासन से ही नहीं संतों से निवेदन है कि वह धर्मनगरी के स्वरूप को संरक्षित करें। -राजेंद्र, प्रबंधक भूमा निकेतन उत्तरी हरिद्वार







