पीढ़ियों तक एक बच्चा नीति के जरिये आबादी को सीमित रखने के बाद अब चीन के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती पैदा हो गई है कि दंपतियों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए कैसे राजी करें। चीन की लंबे समय तक चली एक-बच्चा नीति खत्म हुए एक दशक हो चुका है, लेकिन जन्म दर बढ़ाने के सरकारी प्रयास विफल ही रहे हैं। सोमवार को जारी आबादी के ताजा आंकड़े यही संकेत देते हैं।
एक दशक बाद जन्म दर में 17% गिरावट के साथ चीनी आबादी फिर कम हुई है। कभी दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश रहा चीन अब दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, जबकि भारत सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। सरकारी आंकड़े के मुताबिक 2025 में चीन की कुल जनसंख्या 1.404 अरब रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में 30 लाख कम है। यह लगातार चौथा साल है जब देश की आबादी में गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़े के अनुसार, 2025 में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या सिर्फ 79.2 लाख रही, जो एक साल पहले की तुलना में 16.2 लाख यानी 17% कम है।
बच्चे को पालने की लागत का दबाव
ज्यादातर परिवारों का कहना है कि अत्यधिक प्रतिस्पर्धी समाज में बच्चे की परवरिश की लागत और उससे जुड़ा दबाव बहुत बड़ी बाधा है। आर्थिक मंदी के दौर में जब घरों के लिए रोजमर्रा का खर्च उठाना भी कठिन हो गया है तो यह बोझ और भारी लगने लगा है। एशिया के अन्य देशों की तरह चीन भी गिरती प्रजनन दर की समस्या से जूझ रहा है।
2023 के बाद भारत ने चीन को पछाड़ा
चीन 2023 तक दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश था, लेकिन तब उसे उसके पड़ोसी देश भारत ने पीछे छोड़ दिया। पांच वर्ष पूर्व चीन में जो प्रजनन दर सामने आई, उसे लेकर विशेषज्ञों का अनुमान है कि अब यह लगभग 1 तक आ गई है। यह चीन की आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 से भी काफी कम है। दशकों तक एक से अधिक बच्चे पैदा करने पर रोक लगाने के बाद सरकार ने 2015 में दो बच्चों की अनुमति दी और 2021 में इसे बढ़ाकर तीन कर दिया। चीन की सरकार ने जन्म दर बढ़ाने के लिए नकद सब्सिडी जैसी योजनाएं भी शुरू कीं।







