रसिकोपासना परंपरा के महान आचार्य एवं आचार्यपीठ श्री लक्ष्मणकिला के संस्थापक स्वामी श्री युगलानन्य शरण जी महाराज की पावन 145वीं पुण्यतिथि के अवसर पर भव्य धार्मिक आयोजन संपन्न हुआ।
स्वामी जी द्वारा रचित अमूल्य ग्रंथ “श्रीनाम कांति”, “श्रीधाम कांति”, “संत विनय सतक” आदि का 6 नवंबर से 10 नवंबर तक संगीतमय पाठ बड़े भक्तिभाव से किया गया। इन दिनों श्रद्धालुओं ने रसिक परंपरा के दिव्य भावों का रसपान किया और श्रीधाम अयोध्या का वातावरण पूर्णतः भगवद्मय हो उठा।
11 नवंबर को पुण्यतिथि दिवस पर संतों का वृहद भंडारा एवं सत्संग समारोह आयोजित हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वर्तमान पीठाधीश्वर श्री लक्ष्मणकिलाधीश महंत मैथिली रमन शरण जी महाराज ने की।
इस अवसर पर अनेक प्रमुख संत-महात्माओं ने अपनी उपस्थिति से समारोह की शोभा बढ़ाई, जिनमें जानकी घाट के महंत जन्मेजय शरण, हनुमत निवास के महंत मिथलेश नंदिनी शरण, बड़ा भक्तमाल के महंत अवधेश दास, सियाराम किला के महंत करुणा निधान शरण, हनुमानगढ़ी के महंत संजय दास एवं रमेश दास, रामहर्षण कुंज के महंत अयोध्या दास, अयोध्या के महापौर गिरीशपति त्रिपाठी, महंत अवध किशोर शरण, कानपुर के महंत सीताकांत शरण, महंत अंजनी शरण, महंत रामभद्र शरण, महंत अमित कुमार दास, पार्षद अनुज दास, प्रियेश दास एवं पूर्व पार्षद आलोक मिश्र विशेष रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का समुचित संचालन एवं संयोजन श्री लक्ष्मणकिला के अधिकारी सूर्यप्रकाश शरण द्वारा किया गया। उन्होंने सभी आगंतुक संतों, अतिथियों एवं श्रद्धालुओं का ससम्मान स्वागत एवं अभिनंदन किया।
भव्य भंडारे में हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। समूचा लक्ष्मणकिला परिसर “जय श्रीराम” एवं “राधे-श्याम” के जयघोष से गूंजता रहा।
इस अवसर पर स्वामी जी महाराज के जीवन, उनकी रसिक साधना और संत परंपरा में उनके योगदान पर भी संतों ने विचार व्यक्त किए।









