वी द लीडर आंदोलन से 24 घंटे में जुड़े 13 लाख लोग, क्या विजय जैसा करिश्मा दोहरा पाएंगे अन्नामलाई

तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में अभिनेता से नेता बने विजय की टीवीके पार्टी ने चौंकाने वाला प्रदर्शन किया था। महज दो साल के भीतर विजय ने तमिलनाडु की जनता के बीच ऐसी पैंठ बनाई, जिसने उनकी पार्टी को पलकों पर बिठा लिया। हालांकि, टीवीके बहुमत से 10 सीट कम मिली थीं। इसके बावजूद कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दलों के सहारे उन्होंने गठबंधन की सरकार बना ली।

अब तमिलनाडु के पूर्व भाजपा अध्यक्ष के. अन्नामलाई भी इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करते दिख रहे हैं। अन्नामलाई ने भाजपा से इस्तीफा देकर वी द लीडर आंदोलन शुरू किया है। विजय की पार्टी की तरह ही उनके आंदोलन को भी जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है। बीते 24 घंटों में 13 लाख से ज्यादा लोगों के जुड़ने का दावा किया जा रहा है। इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अन्नामलाई तमिलनाडु की सियासत में विजय जैसा करिश्मा दोहरा पाएंगे?

आंदोलन को लेकर क्या बोले अन्नामलाई?
अन्नामलाई ने भाजपा से इस्तीफा देने के बाद ‘वी द लीडर’ आंदोलन शुरू किया। अन्नामलाई ने एक्स पर पोस्ट में कहा, ”पिछले 24 घंटों में 13 लाख सदस्य जुड़े हैं और आपने जो जबरदस्त समर्थन दिया है, उसके लिए हम आभारी हैं। वी द लीडर आंदोलन ने मुझे अपार गर्व और उससे भी बढ़कर, गहरी जिम्मेदारी का एहसास दिलाया है।”
उन्होंने आगे कहा, ”यह किसी एक व्यक्ति की यात्रा नहीं है; यह सकारात्मक बदलाव की चाह रखने वाले हमारे लोगों की सामूहिक यात्रा है। बदलाव की आवश्यकता में विश्वास रखने वाले प्रत्येक नागरिक की आवाज आपके द्वारा दिए गए अपार समर्थन में गूंजती है। आपके भरोसे का सम्मान करते हुए, आइए हम इस यात्रा को ईमानदारी और समर्पण के साथ आगे बढ़ाएं। तमिलनाडु के उज्ज्वल भविष्य के लिए इस यात्रा में हमारे साथ बने रहें।”
क्यों बढ़े भाजपा नेतृत्व के साथ अन्नामलाई के मतभेद?
तमिलनाडु भाजपा में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान अन्नामलाई के इस्तीफे के तौर पर खुलकर सामने आ गई। हालांकि उनके इस्तीफे के पीछे सिर्फ एक दिन या एक फैसला जिम्मेदार नहीं था। पिछले करीब 18 महीनों से भाजपा नेतृत्व और अन्नामलाई के बीच मतभेद लगातार बढ़ रहे थे। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि एआईएडीएमके के साथ भाजपा का दोबारा गठबंधन इस पूरे विवाद में ताबूत की आखिरी कील साबित हुआ।
भाजपा से इस्तीफे के बाद अन्नामलाई ने कहा कि उन्होंने दिसंबर 2025 में ही भाजपा नेतृत्व को पार्टी छोड़ने की इच्छा बता दी थी। हालांकि पार्टी ने उनसे विधानसभा चुनाव की तैयारियां पूरी करने को कहा था। अन्नामलाई का मानना था कि तमिलनाडु में भाजपा को स्वतंत्र ताकत के रूप में आगे बढ़ना चाहिए। उनकी इस सलाह पर पार्टी नेतृत्व की रणनीति अलग दिखाई दी। यही कारण था कि समय के साथ उनके और केंद्रीय नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ती चली गई। वहीं, लोकसभा चुनाव 2024 में एआईएडीएमके से गठबंधन तोड़कर अलग चुनाव लड़ने के बाद 2026 के विधानसभा चुनाव में दोबारा गठबंधन होने से यह मतभेद चरम पर पहुंच गए।
भाजपा से राहें जुदा, अब आगे क्या होगा?
अन्नामलाई के आंदोलन को मिलते जनसमर्थन से तमिलनाडु की राजनीतिक दिशा में संभावित बदलाव की अटकलें भी तेज हो गई हैं। दरअसल राजनीतिक आंदोलनों की दुनिया में शुरुआती समर्थन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। किसी भी नए संगठन या आंदोलन के लिए शुरुआती दिनों में लोगों को जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती होता है। वहीं, अन्नामलाई के मामले में तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। कई युवा कार्यकर्ता और पूर्व भाजपा समर्थकों ने खुलकर इस फैसले का स्वागत किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अन्नामलाई ने पिछले कुछ वर्षों में तमिलनाडु की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहते उन्होंने पार्टी को राज्य के दूरदराज इलाकों तक पहुंचाने का प्रयास किया। इसके साथ ही खुद को एक आक्रमक लेकिन लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित किया। यही कारण है कि उनके नए राजनीतिक प्रयोग को शुरुआत से ही लोगों का ध्यान मिल रहा है। अपने इस्तीफे के पीछे उन्होंने सबसे बड़ा कारण तमिलनाडु को लेकर अपने और भाजपा नेतृत्व के बीच दृष्टिकोण का अंतर बताया। उनका अनुसार राज्य की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को लेकर उनकी सोच कुछ अलग थी और समय के साथ यह अंतर और स्पष्ट होता गया।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि वी द लीडर केवल एक सामाजिक आंदोलन है या भविष्य की कोई राजनीतिक पार्टी? अन्नामलाई ने इस संबंध में स्पष्ट संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि फिलहाल यह एक आंदोलन है जिसका उद्देश्य तमिलनाडु के लोगों को एक साझा मंच पर लाना है। लेकिन अगर जनता का समर्थन इस तरह मिला तो आगे चलकर एक पूर्ण राजनीतिक दल का रूप भी ले सकता है। उनका कहना है कि राज्य की राजनीति में लंबे समय से एक वैकल्पिक और समावेशी राजनीतिक मंच की जरूरत महसूस की जा रही थी। उनका नया आंदोलन इसी दिशा में एक प्रयास है।
अब विश्लेषक मानते हैं कि अगर अन्नामलाई वास्तव में राजनीतिक पार्टी बनाते हैं तो तमिलनाडु की पारंपरिक राजनीति को चुनौती देने की क्षमता रखते हैं। विशेष रूप से युवाओं और पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता उन्हें एक अलग पहचान दिला सकती है।
तमिलनाडु भाजपा में अन्नामलाई खास क्यों रहे?
राज्य में भाजपा स्वतंत्र पहचान और अकेले ही आगे बढ़ने की वकालत से इतर अन्नामलाई ने अपनी और पार्टी की सियासी जमीन मजबूत करने के लिए जुलाई 2023 में ‘एन मन्न, एन मक्कल’ (मेरी मिट्टी, मेरे लोग) नाम से एक विशाल पदयात्रा शुरू की। इस 168 दिवसीय यात्रा के दौरान उन्होंने राज्य के सभी 234 विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया, जिससे उन्हें आम जनता के बीच अपनी पहचान बनाने और पार्टी का संदेश घर-घर तक पहुंचाने में जबरदस्त मदद मिली। तत्कालीन डीएमके सरकार के खिलाफ अन्नामलाई ने आक्रामक अभियान चलाए थे। उन्होंने मुख्यमंत्री एमके. स्टालिन के रिश्तेदारों से लेकर मंत्रियों (सेंथिल बालाजी और के. पोनमुडी) पर भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए गए थे।
इससे इतर उन्होंने तमिलनाडु की पारंपरिक राजनीति के समीकरणों को तोड़ने की कोशिश की। जातिगत समीकरणों, कल्याणकारी योजनाओं और फिल्मी सितारों वाली तमिलनाडु की राजनीति को अन्नामलाई ने सुशासन, विकास, भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था और तमिल पहचान पर केंद्रित किया। इसमें द्रविड़वाद से हटकर सनातन और हिंदुत्व का मिश्रण था। इस नए दृष्टिकोण ने बहुत लोगों को आकर्षित किया था।
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क्या भाजपा को सता रहा डर?
अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद 14 भाजपा नेताओं ने भी उनके समर्थन में पार्टी से खुद को अलग कर लिया था। इतना ही नहीं, बड़ी संख्या में तमिलनाडु भाजपा के कार्यकर्ताओं ने भी अन्नामलाई को समर्थन देने का एलान किया। इसके चलते अब तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन को खुद मैदान में उतरना पड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ पार्टी सदस्यों को ब्रेनवॉश किया जा रहा है। उन्होंने यह भी साफ किया कि अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद किसी को भी इस्तीफा देने की अनुमति नहीं दी गई है।
नागेंद्रन ने पार्टी सदस्यों से अफवाहों या बाहरी प्रभावों पर विश्वास न करने की अपील की। उन्होंने कहा, “अन्नामलाई ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया और इसे पार्टी ने स्वीकार कर लिया है। कुछ सदस्यों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है और उन्हें यह दावा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है कि उनके पास पीएम मोदी या अमित शाह का आशीर्वाद है। मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि किसी को भी इस्तीफा देने की अनुमति नहीं दी गई है।”
उन्होंने आगे कहा, “मैं भाजपा कार्यकर्ताओं से अपील करता हूं कि वे किसी पर भी विश्वास न करें और इस्तीफा देने से बचें। जो लोग किसी अन्य आंदोलन या पार्टी का हिस्सा हैं, वे भाजपा के सदस्य नहीं रह सकते। अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद पार्टी को कोई झटका नहीं लगा है।”
युवाओं का मिल रहा साथ, क्या भाजपा समर्थक भी मिलाएंगे हाथ?
अन्नामलाई की सबसे बड़ी ताकत उनकी युवा और ऊर्जावान नेता की छवि मानी जाती है। पूर्व आईपीएस अधिकारी रहे अन्नामलाई ने राजनीति में आने के बाद बहुत कम समय में राज्य स्तर पर अपनी पहचान बना ली थी। उन्होंने भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सुधार, रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों को लगातार उठाया। उनकी सभाओं में युवाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिलती है। सोशल मीडिया पर भी उनकी मौजूदगी रही है। यही कारण है कि उनके नए आंदोलन को युवाओं का अच्छा समर्थन मिल रहा है।
राजनीतिक जानकार यहां तक कहते हैं कि अगर अन्नामलाई इस समर्थन को संगठनात्मक ढांचे में बदलने में सफल हुए तो तमिलनाडु की राजनीति में एक प्रभावशाली शक्ति भी बन सकते हैं। इस स्थिति में सवाल उठता है कि क्या भाजपा कार्यकर्ता भी इसमें जुड़ने वाले हैं। अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद सबसे अधिक चर्चा इसी बात की हो रही है, क्योंकि कुछ भाजपा नेताओं ने इस्तीफे भी दिए हैं। वहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नागेंद्रन की ओर से जारी यह बयान सीधे तौर पर दर्शाता है कि अन्नामलाई के भाजपा में रहते हुए जो भी सदस्य पार्टी से जुड़े थे, वे अब धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। हालांकि अभी तक बड़े पैमाने पर पलायन नहीं देखा गया है।
अन्नामलाई के सामने क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि राजनीतिक सफलता केवल शुरुआती समर्थन से तय नहीं होती है। संगठन निर्माण, नेतृत्व टीम, वित्तीय संसाधन और जमीनी नेटवर्क जैसे कई चुनौतियां भी अन्नामलाई के सामने खड़ी हैं। राजनीतिक इतिहास बताता है कि कई आंदोलनों को शुरुआती दौर में भारी समर्थन मिला, लेकिन वह उसे स्थायी राजनीतिक ताकत में नहीं बदल पाए। अन्नामलाई के सामने भी यही चुनौती होगी। उन्हें यह साबित करना होगा कि उनका आंदोलन केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी मौजूद है और अपना संगठन खड़ा कर सकता है।

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इसके अलावा उन्हें यह भी साफ करना होगा कि उनका वैचारिक एजेंडा क्या होगा और वह तमिलनाडु की जनता को क्या नया विकल्प देना चाहते हैं? फिलहाल तमिलनाडु की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अन्नामलाई राज्य में एक नई राजनीतिक धुरी बनने में सफल हो पाएंगे या नहीं? उनके समर्थक इसे तमिलनाडु की राजनीति में बदलाव की शुरुआत बता रहे हैं। वहीं, आलोचक इसे शुरुआती उत्साह मानकर देख रहे हैं। वैसे, इतना तय है कि भाजपा छोड़ने के बाद अन्नामलाई ने जो कदम उठाया है, उसने राज्य की राजनीति में एक नई हलचल जरूर पैदा की है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि वी द लीडर केवल एक आंदोलन बनकर रह जाएगा या फिर तमिलनाडु की राजनीति में एक नई और प्रभावशाली ताकत के रूप में उभरेगा।

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