पंचतत्व में विलीन हुए वीरभद्र, पूरे राजकीय सम्मान से हुआ अंतिम संस्कार

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हिमाचल प्रदेश के दिग्गज नेता और छह बार के मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह का पार्थिव शरीर शनिवार को पंचतत्व में विलीन हो गया। रामपुर के जोगनी बाग में राजकीय सम्मान के साथ शनिवार को उनका अंतिम संस्कार हुआ। देहांत के तीसरे दिन रामपुर में हजारों लोगों ने नम आंखों से राजा साहब को अंतिम विदाई दी। वीरभद्र सिंह के पैतृक राजमहल पद्म पैलेस में सुबह से दोपहर बाद तक कई रस्में चलती रहीं। हजारों लोग कतारबद्ध होकर महल के भीतर प्रवेश करते रहे और वीरभद्र पर श्रद्धासुमन चढ़ाते रहे। दोपहर बाद 3:30 बजे जब वीरभद्र की पार्थिव देह अंतिम यात्रा के लिए बाहर लाई गई तो राष्ट्रीय राजमार्ग-5 पर करीब एक किलोमीटर तक जनसैलाब उमड़ आया। राजा नहीं फकीर थे, हिमाचल की तकदीर थे जैसे नारे लगाते हुए लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। 4:15 बजे वीरभद्र सिंह को बेटे विक्रमादित्य सिंह ने मुखाग्नि दी। इससे पहले पुलिस की टुकड़ी ने उन्हें सलामी दी। शनिवार को रामपुर बुशहर, जुब्बल, कुल्लू आदि रियासतों से बड़ी संख्या में लोग पद्म पैलेस के लिए उमड़ आए। प्रदेश भर से कई नेताओं सहित हजारों लोग यहां पहुंचे। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह, कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता पवन बंसल, प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजीव शुक्ला सहित कई अन्य नेता मौजूद रहे। वीरभद्र सिंह का वीरवार तड़के आईजीएमसी शिमला में देहांत हो गया था। वह दो बार कोरोना संक्रमण से ठीक होने के बाद कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। उनके निधन पर पहले दिन वीरवार को हॉली लॉज शिमला में उन्हें हजारों लोगों ने श्रद्धांजलि दी। दूसरे दिन उन्हें रिज मैदान शिमला में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा, उसके बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी ने राजीव भवन शिमला में श्रद्धांजलि दी गई। वीरभद्र की पार्थिव देह के सामने हुआ विक्रमादित्य का राज्याभिषेक, बुशहर रियासत के 123वें राजा बने
वीरभद्र सिंह के पार्थिव शरीर के सामने पद्म पैलेस में उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह का राज्याभिषेक हुआ। इसी के साथ उन्हें बुशहर रियायत का 123वां राजा चुन लिया गया। बुुशहर रियासत भगवान कृष्ण की वंशावली से संबंधित मानी जाती है। सुबह उन्हें पीपल के पेड़ के नीचे राजगद्दी पर बैठाया गया। यह प्रक्रिया परदे में हुई।
इस दौरान इसके लिए बनाए राजगद्दी कक्ष में केवल राजपरिवार के चुनिंदा लोगों और पुरोहितों को ही अंदर आने की अनुमति रही। दोपहर बाद जैसे ही वीरभद्र सिंह की पार्थिव देह बाहर लाई गई तो उन्हें महल के भीतर राज सिंहासन पर बैठाया गया।

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