उत्तराखंड : कांग्रेस पर पढ़ती नियति की मार, अब प्रीतम-हरीश पर  2022 के विधानसभा चुनाव का दारोमदार

उत्तराखंड में 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी प्रदेश कांग्रेस की कद्दावर नेत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश के असामयिक निधन से कांग्रेसी सदमे में हैं। इसे नियति की मार ही कहेंगे कि अपने जिन क्षत्रपों के दम पर कांग्रेस विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही थी, उनमें से एक क्षत्रप इंदिरा हृदयेश नहीं रही। 

सियासी जानकारों का मानना है कि अब कांग्रेस की पूरी चुनावी सियासत पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह पर केंद्रित हो गई है। ऐसी संभावना है कि कांग्रेस आलाकमान अब राज्य में हरीश रावत का ज्यादा उपयोग करेगा

इंदिरा का अवसान कांग्रेस आलाकमान के लिए भी यह एक बड़ी क्षति है। दरअसल, एक दिन पहले ही पार्टी प्रभारी देवेंद्र यादव ने पार्टी के तीनों क्षत्रपों पूर्व मुख्यमंत्री व एआईसीसी के महा सचिव हरीश रावत, प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश को एकजुटता के साथ चुनाव मैदान में उतरने का पाठ पढ़ाया था। 

सियासी जानकारों का मानना है कि अभी तक पार्टी आलाकमान प्रदेश और प्रदेश के बाहर हरीश रावत का उपयोग कर रहा था। उन्हें पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया था। लेकिन उत्तराखंड में अब विधानसभा चुनाव बहुत दूर नहीं है। नवंबर महीने में कभी भी चुनाव आचार संहिता लागू हो सकती है। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान हरीश रावत को विधानसभा चुनाव के लिहाज से उत्तराखंड में अधिक से अधिक उपयोग कर सकता है। दरअसल, अब कांग्रेस की चुनावी सियासत हरीश रावत और प्रीतम पर केंद्रित हो गई है। 

जहां तक कुमाऊं में सियासी खालीपन का सवाल है तो राजनीतिक अनुभव के तौर पर इंदिरा बेशक कांग्रेस में हरीश रावत से भी पुरानी नेता रही हैं। लेकिन राज्य के नेता के तौर पर जो धाक और स्वीकार्यता हरीश रावत की है, वो इंदिरा की नहीं रही। इंदिरा का कुमाऊं की राजनीति में तो दखल रहा लेकिन वैसा प्रभाव नहीं दिखा जैसा हल्द्वानी और ऊधमसिंह नगर में रहा।

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कद और प्रभाव के लिहाज हरीश रावत को कुमाऊं की राजनीति तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री रहे हैं और वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं। पार्टी का उनका उपयोग व्यापक रूप में ले सकती है। सियासी जानकारों का मानना है कि कुमाऊं में पार्टी के दो प्रमुख नेता विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल व विधायक करन माहरा हैं, जिनमें से किसी एक पार्टी नेता प्रतिपक्ष बनाकर कुमाऊं की जिम्मेदारी सौंप सकती है।

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