उत्तराखंड/चमोली : देवभूमि के कण कण में देवी देवताओं का वास है तो फिर यहां के……….. देखे हमारी खबर ।

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उत्तराखंड देवभूमि के कण कण में देवी देवताओं का वास है तो फिर यहां के गांव और लोग इससे अछूते कैसे रह सकते हैं। यही कारण है कि यहां देवभूमि की सांस्कृतिक, पौराणिक परंपराओं में देवी-देवताओं से मनोतियां मांगने से लेकर उनके पूरी हो जाने पर जन-मानस द्वारा देवी-देवताओं को पूजने और नृत्य कराने की पौराणिक काल से ही प्रथा बनी हुई है जो आज के युग में भी जीवंत है। देवभूमि में महिला पुरुषों पर देवी देवता भी अवतरित होते हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।

पिछले दो सालों से देश और दुनिया भर में कोरोना के संक्रमण से लाखों लोग हताहत हुए। देवभूमि में भी इसने दस्तक दी परंतु कुछ गांवों में लोगों ने अपने ईष्ट देवी देवताओं से मनोतियां मांगी कि उनके गांव और उनके गांव के प्रवासी नौजवानों और लोगों पर कोरोना का साया तक नहीं पड़े।और लोगों का मानना है कि ऐसा ही हुआ भी।सभी सकुशलता से घर गांव लौटे और गांव में भी सभी खुशहाल रहे।

इसी क्रम में पिछले साल से ही यहां देवी देवताओं को पूजने का सिलसिला जारी है। आजकल हरमनी मल्ली गांव में गांव में चारों ओर खुशहाली के लिए पाण्डवों से मनोतियां मांगकर पूरी होने पर ग्रामवासियों ने पाण्डवों का आह्वान कर पाण्डव और देवी-देवताओं को पूजने का आयोजन किया।

आयोजन के शुभारंभ में पहले दिन पय्यां काटने की परंपरा है जिसकी लकड़ियों से पाण्डवों के अस्त्र शस्त्र निर्मित कर उनके प्राण प्रतिष्ठा की जाती है।और पुराने अस्त्र शस्त्र को विसर्जित कर दिया जाता है।इस प्रकार से लोगों पर पाण्डव अवतरित होते हुए नौ दिनों तक नृत्य का कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।पाण्डव काल को पारंपरिक जागर गीतों से पूरा वृतांत सुनाया जाता है। इसके लिए क्षेत्र के विशेष गीतारों को सम्मान के साथ आमंत्रित किया जाता है। जिन्हें पुजारी कहा जाता है।

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आज सातवें दिन हरमनी मल्ली में गैंडा कौथीक का आयोजन हुआ। जिसमें क्षेत्र के लोगों ने भारी संख्या में पाण्डु के श्राद्ध के लिए अर्जुन द्वारा गैंडा वध का शानदार नजारा देखने के साथ ही भेंट पूजा अर्चना कर पाण्डवों का दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।अर्जुन का गैडे के वध के बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद स्वरूप वितरण करने का दृश्य बहुत ही शानदार रहा।लोग मकानों की छतों से लपक लपक कर प्रसाद पाने की आशा में हाथों को ऊपर उठा रहे थे।

इस अवसर पर गांव में अपने ससुराल से ध्याणियां यानी विवाहिता महिला ने भी बड़ी संख्या में अपने मायके के ईष्ट देवताओं के दर्शन और आशीर्वाद लिया।

यहां के लोगों ने बातचीत में बताया कि गांव में पाण्डव लीला का आयोजन पच्चीस साल बाद किया गया। मंगलवार को पाण्डव पाण्डु का श्राद्ध करने के पश्चात गंगा स्नान करने पिण्डर नदी के तट पर गाजे-बाजे के साथ जायेंगे। नौवें दिन कुरुक्षेत्र का और ब्रह्म भोज के साथ ही पाण्डव लीला का विधि-विधान से पूजा अर्चना के उपरांत समापन किया जायेगा।इस दौरान पाण्डवों और कुल ईष्ट देवी-देवताओं से कोरोना की तीसरी लहर से बचाये रखने के लिए भी मनोतियां मांगी जायेगी।


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