ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे…फिल्म शोले का यह गीत हरिद्वार कांवड़ यात्रा के कठिन रास्ते में दोस्तों के उस याराने में जीवंत होता दिखा, जहां एक दोस्त की मन्नत को तीन दोस्तों ने अपनी जिम्मेदारी मान लिया। रुड़की के चार बचपन के दोस्तों ने दोस्ती की मिसाल पेश की। 19 साल के नीटू ने जब पहली बार कांवड़ उठाने और 70 लीटर गंगाजल लेकर अपने गंतव्य तक पहुंचने की ठानी, तो उसके तीन दोस्त उसकी हिम्मत बन गए।
रुड़की के ये चारों दोस्त बचपन के साथी हैं। एक ही मोहल्ले में पले-बढ़े, साथ खेले और जिंदगी के छोटे-बड़े सुख-दुख भी साथ देखे। इसलिए कांवड़ का यह सफर उनके लिए सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं, दोस्ती के उस रिश्ते को निभाने का मौका भी है, जिसकी जड़ें बचपन में हैं। हां, दोस्ती में टांग खिंचाई भी भरपूर दिखी। राहुल ने हंसते हुए बताया कि जब नीटू ने कहा कि उसे गंगाजल लाना है, तो दोस्तों ने सोचा था कि सामान्य सी कांवड़ होगी। लेकिन नीटू तो 70 लीटर का पूरा इंतजाम करके निकल पड़ा। राहुल के मुताबिक, हमें अंदाजा ही नहीं था कि ये इतना गंगा जल लाने की योजना बना रहा।
अब आधा तो भर नहीं सकते थे, इसलिए पूरा भरना पड़ा। जब इतने बड़े पात्र को देखकर नीटू ने चिंता जताई कि इसे लेकर चलेंगे कैसे, तो दोस्तों का जवाब भी दोस्ती के अंदाज में था। अब जो होगा, भोलेनाथ के नाम पर होगा। चल। और फिर चारों चल पड़े। कभी कांवड़ एक कंधे से दूसरे कंधे पर गई, कभी किसी दोस्त ने भार संभाला, कभी किसी ने कपड़ा ठीक किया और कभी किसी ने जोर से जयकारा लगाया।
रास्ता लंबा था। कभी धूप तो कभी तेज बारिश और थकान अपनी जगह थी, लेकिन याराना कदम-कदम पर साथ था। कांवड़ के इस कठिन सफर में नीटू भले ही 70 लीटर जल लेकर निकला हो, लेकिन असल में उसका भार चार कंधों पर बंटा हुआ था। मन्नत एक की हो, लेकिन उसे पूरा करने का सफर चारों का। नीटू ने बताया कि ईश्वर की कृपा से मेरा पास सबकुछ है। बस माता-पिता स्वस्थ रहें यही मन्नत है।








