पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: तृणमूल से बहुसंख्यक नाराज, मुस्लिम सीटों पर झटका, कांग्रेस-लेफ्ट ने किया खेला

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दुर्गा पंडालों और जनसभाओं में मक्का-मदीना की प्रशंसा भरे गीत गाने सहित मुस्लिम मतों को साधने के लिए नई-नई जुगत भिड़ाने का तृणमूल का दांव सफल नहीं रहा। तृणमूल को जहां दूसरे इलाकों में हिंदू मतों के ध्रुवीकरण का झटका लगा, वहीं मुस्लिम मतों के बिखराव का भी दंश झेलना पड़ा। 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हिस्सेदारी वाली 83 सीटें पर त्रिकोणीय मुकाबले में तृणमूल को अपनी 25 सीटें गंवानी पड़ीं। भाजपा ने इन इलाकों में 18 सीटें जीतीं।

 

बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं की कुल मतों में हिस्सेदारी करीब 28 फीसदी है। मुस्लिम मतदाता कई दशकों से 85 सीटों पर जीत-हार की पटकथा लिखते रहे थे। तृणमूल ने पिछली बार इनमें से 75 सीटें हासिल कर प्रचंड जीत दर्ज की थी। इस बार त्रिकोणीय मुकाबले से बाजी पलट गई। चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी कोई कमाल नहीं दिखा सकी।

तृणमूल कांग्रेस, जिसके पास बीते चुनाव में 50 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटरों वाली 43 में से 42 सीटें थी, उसकी संख्या घट कर 30 रह गई। वहीं, 30 फीसदी से अधिक वोटरों वाली 42 मुस्लिम सीटें, जिनमें तृणमूल के पास 33 सीटें थी, इस बार घट कर 20 रह गईं।

त्रिकोणीय लड़ाई में तृणमूल को नुकसान
मालदा, मुर्शिदाबार, उत्तर दिनाजपुर समेत कई क्षेत्रों की मुस्लिम बाहुल्य इन सीटों पर कहीं वाम दल, कहीं हुमायूं कबीर, कहीं एआईएसएफ तो कहीं कद्दावर निर्दलीय उम्मीदवारों ने मुकाबले को त्रिकोणात्मक या बहुकोणीय बना दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा 18 सीटें जीतने में कामयाब रही। हुमायूं कबीर दोनों सीटों पर जीते, मगर तीन अन्य सीटों पर तृणमूल की हार का कारण बने। कांग्रेस, निर्दलीय, एआईएसएफ ने तृणमूल को नुकसान पहुंचाया।

कांग्रेस मुस्लिम बाहुल्य फरक्का, रानीनगर, हुमायूं नौदा और रेजीनगर, एआईएसएफ भांगड़ सीट जीतने में कामयाब रही। इन दलों ने 20 सीटों पर मुस्लिम मतों में बंटवारा कर तृणमूल को नुकसान पहुंचाया।

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ओवैसी की उम्मीदों पर फिरा पानी, एक भी जीत नहीं जीत सके
बंगाल चुनाव ने हैदराबाद से सांसद ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अरमानों पर पानी फेर दिया। पार्टी मुश्किल से बारह सीटें ही लड़ी थी, पर कामयाबी कहीं नहीं मिली। न हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी से गठबंधन तोड़कर अलग होने का फैसला सही ठहरा, न ही मुस्लिम वोटों की ध्रुवीकरण की कोशिश कामयाब हुई। बंगाल की सियासत में राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश करने का उसका मौका फिलहाल उसके हाथ से निकल गया है।

बिहार विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीत कर बेहतर प्रदर्शन करने पर माना जा रहा था कि ओवैसी बंगाल में कुछ बेहतर करेंगे। मुस्लिम वोटों को लेकर उनकी सक्रियता से तृणमूल भी बेचैन हो गई। मालदा जिले की मोथाबाड़ी और सुजापुर, मुर्शिदाबाद की सूती, रघुनाथगंज और कांदी, बीरभूम की नलहाटी और मुरारई, पश्चिम बर्धमान की आसनसोल उत्तर, उत्तर 24 परगना की हाबरा, बारासात और बसीरहाट दक्षिण उत्तर दिनाजपुर की करंदीघी सीट पर चुनाव लड़ा। यह वहीं सीटें हैं जिन्हें पिछली बार तृणमूल ने जीता। इसी कारण तृणमूल ने उस पर भाजपा की बी-टीम के रूप में काम करने और विपक्ष के मुस्लिम वोटों को बांटने का आरोप लगाया।

ओवैसी की पार्टी ने एक दो सीट को छोड़कर हर जगह निराशाजनक प्रदर्शन किया। 12 सीटों पर महज 0.09 फीसदी यानी 53924 वोट ही मिले।


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