उत्तराखंड: वरिष्ठ साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली का निधन, लोक धुनों को राष्ट्रीय स्तर पर दिलाई पहचान

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कुमाऊंनी बोली-भाषा की ठसक और पारंपरिक लोक धुनों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले साहित्यकार और रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली का निधन हो गया। 79 वर्षीय पेटशाली ने बृहस्पतिवार की रात करीब एक बजे अल्मोड़ा के दलबैंड में पैतृक आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से साहित्य, संगीत और रंगमंच जगत में शोक की लहर है।

कुमाऊं की लोककथाओं, संस्कृति और लोकधुनों के साधक जुगल किशोर पेटशाली को जयशंकर प्रसाद पुरस्कार, सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार, उत्तराखंड संस्कृतिकर्मी पुरस्कार और कुमाऊं गौरव सम्मान से नवाजा गया। उन्होंने कुमाऊंनी लोक संस्कृति को संजोने और उसे वैश्विक मंच तक पहुंचाने का काम किया। राजुला-मालूशाही और अजुवा-बफौल जैसी कृतियों ने देश-दुनिया का ध्यान खींचा।

पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक पेटशाली लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने लेखन कार्य अंतिम समय तक जारी रखा। वे पत्नी पुष्पा पेटशाली और अपने छह बेटों सुनील, गिरीश, भुवन, शेखर, हिमांशु और मुकुल सहित नाती-पोतों से भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। शुक्रवार को लखुड़ियार घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके बेटों ने उन्हें मुखाग्नि दी।
 

संस्कृति के साधक
7 सितंबर 1946 को अल्मोड़ा के चितई के पास पेटशाल गांव में जन्मे जुगल किशोर पेटशाली ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत 1990 में लिखी किताब राजुला मालूशाही से की। यह पुस्तक 15वीं शताब्दी की अमर प्रेम गाथा पर आधारित थी। इसे बाद में उन्होंने संगीत नाटिका के रूप में तैयार किया। दूरदर्शन ने इसका फिल्मांकन कर देश-दुनिया तक पहुंचाया। इसके लिए उन्हें जयशंकर प्रसाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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पारंपरिक धुनों को सहेजा
पेटशाली ने कुमाऊंनी लोकगीत और धुनों पर गहन शोध किया। उन्होंने 34 पारंपरिक धुनों जैसे छपेली, चांचरी, झोड़ा, न्योली, भगनौल, बैर और जागर को संजोते हुए अपनी रचनाओं में स्थान दिया। उनकी रचनाएं बताती हैं कि वे लोक से कितने गहराई से जुड़े हुए थे।

पेटशाली का रचना संसार
पेटशाली के नाटकों में लोकगाथाओं की जीवंत झलक दिखाई देती है। राजुला-मालूशाही गीत-नाटिका में भोट प्रदेश की राजुला और बैराठ के राजकुमार मालूशाही का प्रेम अमर हो गया। जय बाला गोरिया नाटिका में गढ़ी चंपावत की रानी कालिंगा की पीड़ा सामने आती है। अजुवा-बफौल नाटक में बफौल भाइयों की वीरता का वर्णन है। नौ-लखा दीवान नाटक में भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय के खिलाफ उठे प्रतिकार को स्वर दिया गया है। कुमाऊंनी बोली-भाषा की ठसक और पारंपरिक लोक धुनों ने उनके नाटकों को एक अलग ही पहचान दी। पेटशाली अब तक 18 से अधिक पुस्तकें लिख चुके थे। उनकी अन्य कृतियों में कुमाऊं के संस्कार गीत, बखत, उत्तरांचल के लोक वाद्य, कुमाऊंनी लोकगीत, पिंगला भृतहरि, कुमाऊं की लोकगाथाएं, गोरी प्यारो लागो तेरो झनकारो, भ्रमर गीत, मेरे नाटक, जी रया जागि रया, गंगनाथ-गीतावली, विभूति योग और हे राम जैसी कृतियां प्रमुख हैं। उनकी कई रचनाओं का आकाशवाणी और दूरदर्शन पर प्रसारण हुआ और अनेक नाटकों की सफल मंचीय प्रस्तुतियां भी हुईं।


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