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प्रदेश सरकार ने राज्य के विभिन्न विभागों, निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती के तहत चयनित होने वाले अभ्यर्थियों की प्रथम नियुक्ति से पूर्व उनके चरित्र सत्यापन को लेकर एक नई नीति जारी कर दी है। नई नीति के तहत हत्या, डकैती, बलात्कार, लज्जा भंग, भ्रष्टाचार, आतंकवादी कृत्य, पेपर लीक, और सॉल्वर गैंग आदि से जुड़े मामलों में लिप्त पाए जाने वाले अभ्यर्थियों के लिए सरकारी नौकरी के दरवाजे पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं।
प्रमुख सचिव एम. देवराज की ओर से केंद्रीय नीति के तहत यह शासनादेश जारी किया गया है, जिसमें पुरानी व्यवस्थाओं को बदलते हुए पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी, समयबद्ध और सख्त बनाया गया है। नई नीति के तहत 30 दिनों के भीतर सत्यापन प्रक्रिया पूरी करनी होगी। जिला पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई (एलआईयू) को सत्यापन रिपोर्ट प्राप्ति के 30 दिन के भीतर नियुक्ति प्राधिकारी को उपलब्ध करानी होगी। समयासीमा में रिपोर्ट न मिलने पर शासन का गृह विभाग इसकी सुध लेगा।
नई नीति के तहत कुछ खास श्रेणियों के अपराधों में लिप्त पाए जाने पर अभ्यर्थी सीधे तौर पर नौकरी के लिए अयोग्य घोषित कर दिए जाएंगे। हत्या, बलवा, देशद्रोह, फिरौती के लिए अपहरण, बलात्कार, दहेज हत्या और पॉक्सो अधिनियम से जुड़े मामलों में आरोप तय होने या दोषसिद्धि पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
नकल माफिया, प्रश्न-पत्र लीक करने वाले, सॉल्वर गैंग, डमी अभ्यर्थी बैठाने वाले, कूट-रचित प्रमाण-पत्र बनवाने वाले, डिजिटल अरेस्ट या यूपीआई ठगी जैसे साइबर अपराधों में शामिल लोग सेवा के लिए पूरी तरह अपात्र होंगे। इसके अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, धन-शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), एनडीपीएस एक्ट (कम मात्रा को छोड़कर) और गैंगेस्टर एक्ट से जुड़े मामलों में भी यही नियम लागू होगा।
हिंसात्मक तरीके से व्यवस्था बदलने वाले संगठनों से जुड़े लोग होंगे अपात्र
जो अभ्यर्थी पहले से ही किसी सरकारी सेवा में कार्यरत हैं, उनके नए सिरे से पूर्ववृत्त और चरित्र सत्यापन की आवश्यकता नहीं होगी, हालांकि उनके पिछले विभाग से जरूरी जानकारी मंगाई जा सकती है। वहीं, राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी को अयोग्य नहीं माना जाएगा, लेकिन हिंसात्मक तरीके से व्यवस्था बदलने वाले संगठनों से जुड़े लोग अपात्र होंगे। 21 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के बाद और जांच की तिथि से तीन वर्ष के भीतर किसी भी ऐसी गतिविधि में भाग लेने को इस बात का प्रमाण माना जाएगा कि व्यक्ति अभी भी ऐसी गतिविधियों में सक्रिय रूप से संलग्न है, जब तक कि समय के इस अंतराल में उसकी प्रवृत्ति में परिवर्तन के सकरात्मक प्रमाण उपलब्ध न हों।