अयोध्या में राधा अष्टमी–सूर्य जयंती: दर्शननगर का सूर्य कुंड बना आस्था का धुरी केन्द्र

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रामनगरी अयोध्या में आज भक्ति का रंग कुछ और गहरा रहा—राधा अष्टमी और सूर्य जयंती, दोनों पर्व एक साथ पड़ने से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। राम मंदिर से लगभग नौ किलोमीटर दूर दर्शननगर स्थित सूर्य कुंड और सूर्य मंदिर दिनभर दर्शन-पूजन के लिए केंद्र में रहे।
जनश्रुति कहती है कि इस प्राचीन कुंड का निर्माण सूर्यवंशी शासकों ने कराया था। मान्यता है यहाँ स्नान और सूर्योपासना से मनोकामनाएँ सिद्ध होती हैं और कठोर रोग भी शमन पाते हैं; कहा जाता है, सूर्यवंशी राजा घोष का कुष्ठ इसी जल में स्नान से शांत हुआ था। उन्नीसवीं शताब्दी में शाकद्वीपी ब्राह्मण राजा दर्शन सिंह ने कुंड और मंदिर का व्यापक पुनरोद्धार कराया, और तभी से आबादी का नाम ‘दर्शननगर’ प्रचलित हुआ। हाल के वर्षों में इस पौराणिक स्थल के संरक्षण-सौंदर्यीकरण पर सरकार ने 14 करोड़ रुपये से अधिक की राशि लगाकर परिसर को नये रूप में संवार दिया, जिससे इसका आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व और उभर आया है।
भाद्रपद के प्रथम रविवार को लगने वाला सूर्य जयंती मेला आज भी पूरे वैभव के साथ सजा। दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं ने प्रातः स्नान के बाद भगवान भास्कर की विशेष अर्चना की। सूर्य मंदिर में सूर्यदेव की प्रतिमा के साथ शनि देव और यमुना देवी की अष्टधातु प्रतिमाओं का पूजन भी विधिवत संपन्न हुआ।
भीड़ को सुव्यवस्थित रखने के लिए प्रशासन ने सुरक्षा बंदोबस्त कड़े किएकुंड के चारों द्वारों और घाटों पर पुलिस तैनाती, बैरिकेडिंग और सतत निगरानी की व्यवस्था रही, जिससे मेले की रस्में शांति और अनुशासन के साथ चलती रहीं।
उधर राधा अष्टमी पर भक्तों की भावनाएँ ब्रज की ओर भी बह चलीं। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर राधा-कृष्ण भक्ति के कीर्तन, झाँकियाँ और संकीर्तन मथुरा, वृंदावन और बरसाना में निरंतर गूंजते रहे; अयोध्या के मंदिरों में भी राधा रानी का श्रृंगार-पूजन और महाआरती दिनभर आकर्षण का केंद्र बने।
दो पर्व, एक दिन अयोध्या में आज की यह संयोजकता केवल उत्सव का दृश्य नहीं, बल्कि परंपरा, संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी का ऐसा संगम रही जिसने श्रद्धा के साथ-साथ विरासत के प्रति सजगता को भी मुखर किया।

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