PM MODI: खून और पानी एक साथ नहीं बहेंगे, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर पीएम बोले- अगर हम आत्मनिर्भर न होते तो..

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 79वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की ऐतिहासिक प्राचीर से राष्ट्र के नाम अपने लगातार 12वें संबोधन में केसरिया पगड़ी पहनकर जश्न मनाया। पीएम मोदी ने सफेद कुर्ते और चूड़ीदार पायजामा के साथ केसरिया बंदगला जैकेट और तिरंगा स्टोल पहना था। उन्होंने लाल किले की प्रचीर से ऑपरेशन सिंदूर और सिंधू जल संधि का जिक्र किया।

पीएम मोदी ने कहा, ‘खून और पानी एक साथ नहीं बहेंगे। अब देशवासियों को भली-भांति पता चला है कि सिंधु का समझौता कितना अन्यायपूर्ण और एकतरफा है। भारत से निकलती नदियों का पानी दुश्मनों के खेतों को सींच रहा है और मेरे देश की धरती बिना पानी के प्यासी है। कैसा समझौता था, जिसने पिछले सात दशक से मेरे देश के किसानों का अकल्पनीय नुकसान किया है। हिंदुस्तान के हक का जो पानी है। उस पर अधिकार सिर्फ और सिर्फ हिंदुस्तान का है। हिंदुस्तान के किसानों का है। भारत कतई सिंधु समझौते को जिस स्वरूप में सहता रहा है, उसे नहीं सहेगा। किसान हित में और राष्ट्रहित में यह समझौता हमें मंजूर नहीं है।’

 

अगर हम आत्मनिर्भर न होते तो क्या हम इस तरह हो पाते
उन्होंने कहा कि हमने ऑपरेशन सिंदूर में देखा कि आत्मनिर्भर भारत कितना सक्षम है। दुश्मन को पता भी नहीं चला कि कौन सा सामर्थ्य है, जो उन्हें पल भर में खत्म कर रहा है। अगर हम आत्मनिर्भर न होते तो क्या हम इस तरह हो पाते। सप्लाई मिलेगा कि नहीं, कौन देगा कौन नहीं। हमारे मेक इन इंडिया की बदौलत हमारी सेना पराक्रम करती रही। बीते 10 साल से हम मेक इन इंडिया को मिशन की तरह लेकर चले हैं। 21वीं सदी तकनीक की सदी है। जब तकनीक ड्रिवेन सदी है तो इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने तकनीक में बढ़ोतरी हासिल की वो देश शिखर पर पहुंच गए। आर्थिक शक्ति के पैमाने पर पहुंचे हैं।

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हमारे सामर्थ्य को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भर होना अनिवार्य
उन्होंने कहा कि आजादी के लिए असंख्य लोगों ने बलिदान दिया। अपनी जवानी खपा दी। जेलों में जिंदगी गुजार दी। कुछ लेने बनने के लिए नहीं, भारत के स्वाभिमान के लिए। कोटि-कोटि लोगों की आजादी के लिए। गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए। मन में एक ही भाव था स्वाभिमान। गुलामी ने हमें निर्धन बना दिया। गुलामी ने हमें निर्भर भी बना दिया और हमारी निर्भरता बढ़ती गई। हम सब जानते हैं कि आजादी के बाद कोटि-कोटि जनों के पेट भरना बड़ी चुनौती थी। यही मेरे देश के किसान है, जिन्होंने खून-पसीना एक कर देश के भंडार भर दिया। देश को आत्मनिर्भर बना दिया। आजादी पर उतना ही बड़ा प्रश्नचिह्न भी लग जाता है। दुर्भाग्य तो तब है जब निर्भरता की आदत लग जाए। पता ही न चले हम कब आत्मनिर्भरता छोड़ रहे हैं और कब निर्भर हो जाएं। इसीलिए आत्मनिर्भर होने के लिए हर वक्त जागरूक होना पड़ता है। आत्मनिर्भरता का नाता सिर्फ आयात और निर्यात, पैसे और डॉलर तक सीमित नहीं है। इसका नाता हमारे सामर्थ्य से जुडा हुआ है। जब आत्मनिर्भरता खत्म होने लगती है तो सामर्थ्य भी निरंतर क्षीण होता जाता है। इसलिए हमारे सामर्थ्य को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए आत्मनिर्भर होना अनिवार्य है।


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