पिथौरागढ़: रात में गूंजते ढोल..11 साल बाद हिंदुओं की खुदा पूजा शुरू, इस गांव में हुई 6 दिनी उत्सव की शुरुआत

Spread the love

 

 

पिथौरागढ़ में इन दिनों आधी रात को गूंजती ढोल-नगाड़ों की थाप, हवा में घुली अगरबत्ती की महक और अलखनाथ का आह्वान सब मिलकर सदियों पुरानी परंपरा को फिर जीवित कर रहे हैं। 11 साल बाद हिंदुओं की ऐतिहासिक खुदा पूजा की शुरुआत हो चुकी है। ऐसी पूजा जिसमें भगवान शिव के अलखनाथ स्वरूप का रात्रि अंधेरे में गुप्त रूप से स्वागत किया जाता है।

तल्ला जोहार के होकरा गांव में पंडित खष्टी बल्लभ द्विवेदी ने बृहस्पतिवार को शुभ मुहूर्त में धूनी में अग्नि प्रज्ज्वलित कर खास पूजा की शुरुआत की। प्रधान धामी देव राम ने धूनी पूजन किया। सनातन धर्म को मानने वालों की ओर से जाने वाली यह पूजा मुगल काल से चली आ रही है। कहा जाता है कि जब मुगल सैनिकों ने ग्रामीणों को पूजा करते देखा तो उन्होंने भय के चलते इसे खुदा पूजा बताया। तब से यह नाम परंपरा की तरह गांवों में रच-बस गया। इस बार 30 नवंबर तक स्तुति गायन चलेगा और 1 दिसंबर को प्रसाद वितरण के साथ इस अनूठे आयोजन का समापन होगा।

 

छत खुली रहती है, यहीं से आते हैं अलखनाथ
इस पूजा की सबसे रहस्यमय और अनोखी परंपरा वह मकान है जिसकी छत का एक हिस्सा खुला छोड़ा जाता है। मान्यता है कि भगवान अलखनाथ इसी खुले स्थान से पूजा में प्रवेश करते हैं। पूजा हमेशा देर रात, एकांत और शुचिता वाले स्थान पर की जाती है।

कलश यात्रा से शुरुआत, 90 परिवारों की भागीदारी
उन क्षेत्रों में रहने वाले 90 परिवारों की सहभागिता के साथ पूजा की शुरुआत कलश यात्रा से हुई। पवित्र नदियों और नौलों में स्नान, जलाभिषेक, पंचामृत से शुद्धिकरण, सब मिलकर माहौल को आस्था से भर देते हैं। पूजा के पहले दिन देवडांगरों को गाजे-बाजे के साथ स्नान कराया जाता है। दिन में अलखनाथ, दुर्गा, कालिका और स्थानीय देवताओं की स्थापना की जाती है।

 

और पढ़े  देहरादून: अगस्त के पहले हफ्ते में उत्तराखंड आएंगे मल्लिकार्जुन खरगे, हल्द्वानी में रैली कराने की तैयारी

 

पद्म वृक्ष को पैंय्या न्योता
खुदा पूजा में पैंय्या न्योता (पद्म वृक्ष को विशेष न्यौता) दिया जाता है। पद्म की टहनियां गाजे-बाजे के साथ पूजा स्थल लाई जाती हैं। इन्हें पार्वती का स्वरूप मानकर बाबा अलखनाथ के विवाह की रस्म भी संपन्न होती है।

 

 

सैकड़ों श्रद्धालुओं को बुलावा
तल्ला जोहार के कई गांवों से सैकड़ो लोगों को इस आयोजन में आमंत्रित किया गया है। संध्या को गणेश पूजन और महाआरती के बाद जगरिए अलखनाथ की गाथा गाते हैं। इसी दौरान माना जाता है कि देवता डांगरों पर अवतरित होते हैं और ढोल नगाड़ों की लय पर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। पूजा स्थल पर पर्दा लगाया जाता है। माना जाता है कि शिव अलखनाथ रूप में एकांत पसंद करते हैं। मुनस्यारी के कई गांवों में खुदा पूजा का आयोजन होता है जो 3 से लेकर 22 दिनों तक चलती है।

 

 

 

आस्था के स्वर
यह आयोजन सिर्फ धर्म नहीं, परंपरा, इतिहास, आस्था और उन कथाओं का संगम है। यह पीढ़ियों से पहाड़ों के लोगों को जोड़ती आई हैं। -पानुली देवी, 96 वर्षीय बुजुर्ग

 

 

सदियों पुराने अटूट विश्वास से यह परंपरा जुड़ी है। मान्यता है कि अगर पद्म पत्ता तोड़ते समय गरुड़ पेड़ पर बैठ जाए तो साल भर सुख-समृद्धि बनी रहती है। -उमेद राम, 80 वर्षीय बुजुर्ग

 

 

श्रद्धालु रात में भजन-कीर्तन और झोड़ा-चाचरी गायन करते हैं। जब गाथा शुरू होती है तो ऐसा लगता है मानो अलखनाथ सचमुच सामने खड़े हों। -अमर राम, अलखनाथ के गायक

 

 

बचपन में हम आधी रात को ढोल की आवाज सुनकर उत्साहित हो जाते थे। यह सिर्फ पूजा नहीं, हमारी सदियों पुरानी पहचान और विश्वास की विरासत है। -संतोष कुमार, ग्राम प्रधान

और पढ़े  रुद्रप्रयाग: बारिश से जनजीवन प्रभावित, मौसम खराब होने पर रोकी जा रही केदारनाथ यात्रा

Spread the love
  • Related Posts

    देहरादून – कार्रवाई: 25 लाख की साइबर ठगी का मास्टरमाइंड बंगाल से गिरफ्तार, फर्जी फर्म खोलकर लगाता था चपत

    Spread the love

    Spread the loveउत्तराखंड स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) की साइबर क्राइम पुलिस ने 24.95 लाख रुपये की साइबर ठगी के मामले में बड़ी सफलता हासिल करते हुए अंतर्राज्यीय साइबर गिरोह के…


    Spread the love

    रामनगर- घास काटने गई 65 वर्षीय बुजुर्ग महिला पर बाघ का हमला, गंभीर रूप से घायल

    Spread the love

    Spread the loveरामनगर के मोहान स्थित ग्राम कुनखेत में रविवार सुबह घास काटने गई एक बुजुर्ग महिला पर बाघ ने हमला कर दिया। हमले में महिला गंभीर रूप से घायल…


    Spread the love