महाराष्ट्र-  किस पार्टी के पास कितने वार्ड?: जानें 29 महानगरपालिकाओं में किस पर-किसे बढ़त,क्या है मायने 

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हाराष्ट्र महानगरपालिका चुनावों के नतीजे आने जारी हैं। इन चुनावों में इस बार भरतीय जनता पार्टी को साफ बढ़त मिलती दिख रही है। 29 में से 25 से ज्यादा महानगरपालिकाओं में भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन को जीत हासिल हुई है। दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना भी कई महानगरपालिकाओं में सीटें जुटाने में कामयाब रही है।

 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर मौजूदा समय में अलग-अलग शहरों में राजनीतिक दलों के लिए क्या नतीजे रहे हैं? बीते चुनाव के मुकाबले इस बार नतीजे कैसे और कितने बदल गए?नतीजों के मायने क्या हैं? आइये जानते हैं…

 

2017 के महानगरपालिका चुनाव के क्या नतीजे थे?

भाजपा ने कहां हासिल की थी बढ़त
1. पुणे: 2017 के चुनावों में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और मुक्ता तिलक शहर की पहली भाजपा मेयर बनीं।
2. पिंपरी-चिंचवड़: भाजपा ने पहली बार 77 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल किया।
3. नागपुर: 2017 के चुनावों में भाजपा ने 108 सीटों के साथ जीत दर्ज की।
4. नासिक: भाजपा ने 66 सीटों पर जीत हासिल की और रंजना भानसी मेयर बनीं।
5. अकोला: 2017 के चुनाव परिणामों में भाजपा को 48 सीटें मिलीं।
6. अमरावती: फरवरी 2017 के चुनावों में भाजपा ने 45 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की।
7. सोलापुर: भाजपा ने 49 सीटों के साथ जीत हासिल की और शोभा बनशेट्टी मेयर बनीं।
8. लातूर: 2017 के चुनावों में भाजपा को 36 सीटों के साथ बहुमत मिला।
9. चंद्रपुर: अप्रैल 2017 के चुनावों में भाजपा ने 39 सीटें जीतीं।
10. मीरा-भायंदर: भाजपा ने 61 सीटों के साथ जीत दर्ज की और डिंपल मेहता मेयर चुनी गईं।
11. पनवेल: मई 2017 के चुनावों में भाजपा (गठबंधन के साथ) ने 51 सीटें जीतीं।
12. उल्हासनगर: 2017 के चुनावों में भाजपा ने 32 सीटों के साथ सबसे अधिक सीटें जीतीं।
13. धुले: भाजपा ने 73 में से 50 वॉर्ड्स जीतकर महानगरपालिका में बहुमत हासिल किया।
14. कोल्हापुर: भाजपा यहां 81 में से 38 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी।

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शिवसेना के पास कौन सी महानगरपालिकाओं में थी ताकत
15. बृहन्मुंबई (बीएमसी): 2017 के चुनावों में शिवसेना 84 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही।
16. ठाणे: शिवसेना ने 67 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया।
17. कल्याण-डोंबिवली: शिवसेना के पास 52 सीटें थीं और राजेंद्र देवलेकर मेयर थे।
18. अहमदनगर: 2017 के दौरान शिवसेना की सुरेखा कदम मेयर थीं।
19. औरंगाबाद:  शिवसेना के नंदकुमार घोड़ेले मेयर के पद पर थे।
कांग्रेस किन महानगरपालिकाओं में ताकतवर थी
20. नांदेड़-वाघाला: अक्तूबर 2017 के चुनावों में कांग्रेस ने 73 सीटों के साथ भारी जीत दर्ज की।
21. भिवंडी-निजामपुर: 2017 के चुनावों में कांग्रेस ने 47 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया।
22. परभणी: अप्रैल 2017 के चुनावों में कांग्रेस ने 31 सीटें जीतीं और मीना वारपुडकर मेयर बनीं।
23. मालेगांव: मई 2017 के चुनावों में कांग्रेस ने 28 सीटें जीतकर मेयर पद हासिल किया।

अन्य दलों के पास महानगरपालिकाएं
24. सांगली-मिरज-कुपवाड़: भाजपा 38 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही। राकांपा के पास 21 सीट रहीं और कांग्रेस की 19 सीटें थीं।
25. नवी मुंबई: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के पास 52 सीटों के साथ सत्ता थी।
26. वसई-विरार: यहां बहुजन विकास अघाड़ी (बीवीए) ने 106 सीटों के साथ अपना वर्चस्व बनाए रखा।
27. जलगांव: 2017-2018 के दौरान महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के ललित कोल्हे मेयर थे।

28. जालना और 29. इचलकरंजी (2023 में नगरपालिका के तौर पर अस्तित्व में आए)

नतीजों के क्या मायने?

विश्लेषकों के मुताबिक, इस चुनाव में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन की एक वजह महायुति की एकजुटता, देवेंद्र फडणवीस की छवि और महाविकास अघाड़ी के बीच लगातार बढ़ती दूरियां रहीं। वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत शिंदे और अन्य विश्लेषकों ने इसकी कुछ वजहें भी बताईं…

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1. मुख्यमंत्री का नेतृत्व और रणनीति: देवेंद्र फडणवीस इस जीत के मुख्य नायक और न्यूक्लियस बनकर उभरे। उन्होंने स्थानीय चुनावों को विधानसभा या संसदीय चुनावों की तरह गंभीरता से लिया और कई रैलियां कीं। उनकी रणनीति इतनी सटीक थी कि उन्होंने विपक्ष के ‘मराठी अस्मिता’ कार्ड को विफल करने के लिए एक सामरिक कदम उठाया और मुंबई में पीएम मोदी या अमित शाह जैसे केंद्रीय नेताओं को आमंत्रित नहीं किया, ताकि विपक्ष को ‘गुजरात बनाम महाराष्ट्र’ या ‘उत्तर भारत विरोधी’ अभियान चलाने का मौका न मिले।

2. विपक्ष का बिखराव और रणनीतिक चूक: महाविकास अघाड़ी (MVA) में एकजुटता की कमी थी और वे विभाजित होकर चुनाव लड़े। कांग्रेस की रणनीतिक चूक के कारण, विशेष रूप से वंचित बहुजन अघाड़ी के साथ गठबंधन के मामले में, विपक्षी वोटों का भारी नुकसान हुआ। वहीं, उद्धव ठाकरे की पार्टी की नींव हिल गई थी, क्योंकि उनके कई नगर सेवक और विधायक उनका साथ छोड़ चुके थे।

3. हिंदुत्व और जातिगत समीकरण: भाजपा ने ‘मराठी अस्मिता’ की राजनीति का मुकाबला करने के लिए हिंदुत्व के मुद्दे को समझदारी से आगे बढ़ाया, जिससे उन्हें जाति और समुदाय के विभाजन से ऊपर उठकर वोटों को एकजुट करने में मदद मिली।

4. कमजोर पड़ा ‘मराठी कार्ड’, महायुति को सत्ता का फायदा: विश्लेषकों का कहना है कि उद्धव ठाकरे का यह दावा कि मुंबई हमारी है, अब कमजोर पड़ गया है और मुंबई पर उनका दबदबा खत्म हो चुका है। चंद्रकांत शिंदे कहते हैं कि ऐसी प्रबल संभावना है कि उद्धव ठाकरे के नवनिर्वाचित पार्षद आने वाले समय में एकनाथ शिंदे गुट या भाजपा में शामिल हो जाएं। उन्होंने कहा कि इसका मुख्य कारण यह है कि राजनीति में सत्ता और संसाधनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है और वर्तमान में महायुति सत्ता में हैं।

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उन्होंने आगे कहा, महायुति के पास न केवल सत्ता है, बल्कि वे विकास कार्यों और चुनाव प्रचार के लिए पर्याप्त धन भी खर्च कर सकते हैं,। यदि किसी पार्षद या महापौर को अपने निर्वाचन क्षेत्र में काम करना है, अपने मतदाताओं को बांधे रखना है या भविष्य में विधायक का चुनाव लड़ना है, तो उसके लिए सत्ताधारी गठबंधन के साथ जाना अधिक फायदेमंद साबित हो सकता है।


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