नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी के बेल बाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए शासन द्वारा भूमि आरक्षित किए जाने और प्रशासनिक स्वीकृति दिए जाने के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई के बाद मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 अगस्त की तिथि नियत की है।
यह इलाका हाथी कॉरिडोर भी है। याचिका में कहा कि उत्तराखंड राज्य पर्वतीय अवधारणा को लेकर बना है, इसी भावना के कारण कई लोगों ने राज्य की लड़ाई में अपना बलिदान दिया और अब प्रमुख संस्थान को पहाड़ से मैदान ले जाने का क्या कारण है, यदि हाईकोर्ट शिफ्ट ही होना है तो पहाड़ में शिफ्ट हो। याचिकाकर्ता ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के 15 जुलाई 2026 के आदेश से फॉरेस्ट जमीन का स्वरूप नहीं बदलता है। यह एक रिजर्व फॉरेस्ट था और उत्तराखंड सरकार की 12 अगस्त 2026 की अधिसूचना में भी उस जमीन को “फॉरेस्ट जमीन” लिखा गया है। फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट, 1980 के अनुसार, ना तो सर्वोच्च न्यायालय और ना ही हाईकोर्ट के पास रिजर्व फॉरेस्ट जमीन को डी-रिजर्व करने का अधिकार है।
एक्ट के प्रावधानों के अनुसार, ऐसा करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। सुनवाई पर राज्य सरकार की तरफ से कहा गया कि इस मामले में आगे कि प्रक्रिया चल रही है, जहां पर कोर्ट को शिफ्ट किया जाना है। वह कोई हाथी कोरिडोर नहीं है। उच्च न्यायालय को शिफ्ट करने के विरोध में अधिवक्ताओ ने कहा कि जिला अधिकारी ने जब इस मामले में स्टे चल रहा था तो किस आधार पर मई 2026 को इस भूमि को कोर्ट के लिए हस्तांतरित करने का प्रस्ताव कैसे तैयार किया। इनके खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए। साथ ही कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि नैनीताल जिले में जहां भी जैसे भी भूमि हो उसे शिफ्ट किया जाए। लेकिन सरकार उसे हल्द्वानी में ही शिफ्ट क्यों करना चाहती है। कई अन्य जगहों पर भी जमीने उपलब्ध हैं।






