धर्मसंकट में ‘आप’: केजरीवाल के अति नजदीकियों को तोड़ BJP ने लगाया बड़ा दांव, अब पंजाब में खेला होगा

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24 अप्रैल 2026 भारतीय राजनीति में बड़े उलटफेर के तौर पर दर्ज हो गया है। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के एक साथ इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से पार्टी को बड़ा झटका लगा है।

 

 

यह घटनाक्रम पार्टी में नेतृत्व रणनीति और भरोसे पर सीधा असर माना जा रहा है। अब पार्टी के सामने पंजाब में सरकार की स्थिरता बनाए रखने के साथ संगठन को एकजुट रखना बड़ी चुनौती बन गया है।

दस में से सात सांसदों ने छोड़ा साथ

पार्टी के 10 में से 7 सांसदों के जाने से राज्यसभा में आप की स्थिति कमजोर हुई है। पंजाब से राघव चड्ढा संदीप पाठक और अशोक मित्तल जैसे चेहरे पार्टी की रणनीति और संगठन दोनों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। राघव चड्ढा जहां विधायकों और मंत्रियों के संपर्क में रहते थे वहीं संदीप पाठक को संगठन का रणनीतिक दिमाग माना जाता था। अशोक मित्तल का प्रभाव संगठन के साथ आर्थिक मोर्चे पर भी मजबूत रहा है और वे कई नेताओं को पार्टी में लाने में सक्रिय रहे हैं।

2022 में संदीप पाठक व राघव चड्ढा ने संभाली थी कमान

साल 2022 में पंजाब में आप की जीत के पीछे संदीप पाठक और राघव चड्ढा की अहम भूमिका रही थी। संदीप पाठक ने चुनावी रणनीति तैयार की और जमीनी स्तर पर टीमों को सक्रिय किया जबकि राघव चड्ढा ने पार्टी का प्रमुख चेहरा बनकर प्रचार की कमान संभाली।

टिकट वितरण से लेकर चुनावी मुद्दों तक दोनों की भूमिका निर्णायक रही। ऐसे में इन नेताओं के जाने से संगठनात्मक ढांचे और चुनावी प्रबंधन पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। संगठन के भीतर सामने आई दरार लंबे समय से पनप रही असंतुष्टि का संकेत देती है। बगावत करने वाले नेताओं ने पार्टी पर अपनी मूल विचारधारा से भटकने के आरोप लगाए हैं। इसका असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ सकता है।

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संगठन के लिए भी चुनौती

पंजाब इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बना हुआ है। नेताओं में असंतोष बढ़ने या टूट की स्थिति में सरकार की स्थिरता पर भी सवाल उठ सकते हैं। संगठनात्मक स्तर पर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण है। संदीप पाठक के जाने से चुनावी मैनेजमेंट और बूथ स्तर के नेटवर्क पर असर पड़ सकता है। वहीं राघव चड्ढा और अशोक मित्तल के जाने से शहरी और युवा वर्ग में भी संदेश गया है। इसे नजरअंदाज करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा।

विधायकों को एकजुट रखना, कार्यकर्ताओं का भरोसा कायम रखना और जनता के बीच अपनी छवि को मजबूत करना आप के लिए चुनौती है। पार्टी के भीतर असंतोष पहले से मौजूद था। कई नेताओं पर कार्रवाई और कुछ के जेल जाने से संगठन पहले ही दबाव में था। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह घटनाक्रम एक सीमित राजनीतिक झटका है या बड़े बदलाव की शुरुआत।

भाजपा ने 2027 के लिए आधार मजबूत किया

आप के सांसदों को तोड़कर भारतीय जनता पार्टी ने पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए एकला चलो की रणनीति पर काम तेज कर दिया है।

पार्टी ने संकेत दे दिए हैं कि वह इस बार भी किसी गठबंधन के बजाय अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी। मोगा रैली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पहले ही इसका इशारा कर चुके थे जबकि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी इसे आगे बढ़ाया है। इसके साथ ही पार्टी ने राज्य में अपना आधार मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है।

शिअद के साथ तीन बार बनाई है सरकार

भाजपा ने शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन में पंजाब में तीन बार सरकार बनाई थी लेकिन यह साथ 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले टूट गया। इसके बाद भाजपा पहली बार अकेले मैदान में उतरी और उसे 6.6 प्रतिशत वोट मिले। हालांकि इसके बाद पार्टी ने लगातार संगठन पर काम किया और 2024 के लोकसभा चुनाव में अकेले उतरते हुए अपना वोट प्रतिशत बढ़ाकर 18.56 फीसदी तक पहुंचा दिया।

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इस प्रदर्शन से पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व संतुष्ट नजर आया और इसी के बाद 2027 का चुनाव भी अकेले लड़ने का फैसला लगभग तय हो गया। हालांकि कांग्रेस से भाजपा में आए कुछ नेताओं ने शिअद के साथ गठबंधन की वकालत की थी लेकिन पार्टी के पुराने नेताओं ने इसका विरोध किया। बाद में अमित शाह ने यह कहकर स्थिति स्पष्ट कर दी कि जिस राज्य में भाजपा का वोट प्रतिशत 18 फीसदी से अधिक हो जाता है वहां पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में आ जाती है।

जनाधार वाले चेहरों पर फोकस

अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति के तहत भाजपा अब संगठन को मजबूत करने के साथ प्रभावशाली नेताओं को जोड़ने में जुटी है। पार्टी ऐसे चेहरों की तलाश कर रही है जिनकी अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ हो और जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों। पिछले कुछ समय में भाजपा ने कई चर्चित नेताओं को शामिल किया है और यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहने के संकेत हैं।

कुल मिलाकर भाजपा पंजाब में गठबंधन की राजनीति से अलग अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने और मजबूत जनाधार तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

दल-बदल की सियासत को मिली रफ्तार

आप की टूट से राज्य के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। इससे भाजपा के 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने के मिशन को जबरदस्त गति मिल गई है।

भाजपा, जो वर्षों तक शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के साथ गठबंधन में केवल 23 सीटों तक सीमित थी, अब पूरे राज्य में अपने दम पर चुनाव लड़ने की रणनीति को आक्रामक रूप से आगे बढ़ा रही है। आप के सात सांसदों के शामिल होने से पार्टी को न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिली है, बल्कि पंजाब में भी संगठनात्मक और राजनीतिक बढ़त का संदेश गया है।

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पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की पहले ही स्पष्ट घोषणा थी कि पंजाब में चुनाव अकेले लड़ा जाएगा। अब इस ताजा दल-बदल के बाद भाजपा को नए चेहरों और सत्ताधारी आप सरकार के अनुभवी नेताओं का मिश्रण मिल गया है। इससे 94 नई सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना को और धार मिलेगी और दूसरी पंक्ति की लीडरशिप तैयार करने का रास्ता भी साफ होगा।

2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर शिअद से अलगाव को जहां पहले भाजपा की कमजोरी माना गया था, वहीं अब पार्टी इसे अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता और विस्तार के अवसर के रूप में देख रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 18% से अधिक वोट शेयर हासिल करना पहले ही संकेत दे चुका था कि भाजपा अब राज्य में बड़ी भूमिका के लिए तैयार है।

भाजपा को फायदा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस ताजा घटनाक्रम ने भाजपा को मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दोनों तरह की बढ़त दी है। हालांकि, किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि और ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित पकड़ अभी भी पार्टी के लिए चुनौती बनी हुई है।

स्पष्ट है कि 2027 का विधानसभा चुनाव अब और दिलचस्प हो गया है। भाजपा 23 सीटों की सीमित राजनीति से निकलकर 117 सीटों पर पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है—और शुक्रवार की इस सियासी उथल-पुथल ने उसके इस मिशन को नई रफ्तार दे दी है।


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