प्रदूषण से मुक्ति: UP मॉडल से स्नान योग्य हुई गंगा की पावन धारा, नमामि गंगे अभियान से संभव हुआ शुद्धिकरण

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शकों से प्रदूषण की मार झेल रही गंगा उत्तर प्रदेश में अब नई इबारत लिख रही है। नमामि गंगे अभियान के तहत हुए भारी निवेश और आधुनिक तकनीक के समन्वय से गंगा की मुख्यधारा अब पूरी तरह स्नान-योग्य श्रेणी में आ चुकी है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ताजा रिपोर्ट ने इस ऐतिहासिक सुधार पर वैज्ञानिक मुहर लगा दी है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, 2018 तक कन्नौज से वाराणसी तक का एक बड़ा हिस्सा प्राथमिकता-चार नामक खतरनाक प्रदूषित श्रेणी में रखा गया था। आज वह पूरी पट्टी साफ हो चुकी है। अब प्रदूषण केवल फर्रुखाबाद, डालमऊ और मिर्जापुर के तीन बेहद छोटे हिस्सों तक सिमट गया है, जिन्हें न्यूनतम प्रदूषण (प्राथमिकता-पांच) की श्रेणी में रखा गया है।

 

    • उत्तर प्रदेश में गंगा का प्रवाह सबसे लंबा होने के कारण चुनौती बड़ी थी। इससे निपटने के लिए 16,201 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। राज्य की 80 परियोजनाओं में से 53 पूरी हो चुकी हैं, जिससे 1,520 एमएलडी शोधन क्षमता चालू है
    • वाराणसी, कानपुर और प्रयागराज जैसे 11 बड़े शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट मिशन मोड में काम कर रहे हैं
    • अकेले वाराणसी और आगरा में लाखों नागरिकों के गंदे पानी का शोधन हो रहा है, जिससे गंगा में सीधे गिरने वाला कचरा रुक गया है

शून्य प्रदूषण का संकल्प
अगला लक्ष्य गंगा को शून्य प्रदूषण के स्तर पर ले जाना है। बचे हुए तीन छोटे हिस्सों के लिए भी कार्य योजना तैयार है। एनएमसीजी के उप महानिदेशक नलिन कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, बीओडी मानकों में सुधार यह साबित करता है कि दशकों बाद गंगा की जल गुणवत्ता में वास्तविक और वैज्ञानिक सुधार हुआ है।

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बलिया से फरक्का तक गंगा की होगी 3डी मैपिंग
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने गंगा नदी के प्रबंधन के लिए एक बड़ी योजना शुरू की है। इसके तहत उत्तर प्रदेश के बलिया से पश्चिम बंगाल के फरक्का तक गंगा कॉरिडोर का हवाई लिडार सर्वे और 3डी मैपिंग कराई जाएगी। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत शुरू यह परियोजना यूपी, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से गुजरने वाली नदी के हिस्सों को कवर करेगी।

अत्याधुनिक जियोस्पेशियल तकनीक के जरिये नदी का 3डी डिजिटल ट्विन तैयार किया जाएगा। इसमें मानवयुक्त विमानों, ड्रोन और फोटोग्रामेट्री का उपयोग होगा। इसका मकसद नालों के निकास द्वारों, संगम बिंदुओं और बाढ़ क्षेत्रों की सटीक पहचान करना है।


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