दिल्ली- ब्रिक्स सम्मेलन ने लौटाया 80 के दशक वाला कनॉट प्लेस, अतिक्रमण हटते ही बदली बाजार की तस्वीर

कनॉट प्लेस का नजारा इन दिनों ऐसा है मानो दिल्ली ने अपने पुराने एलबम का एक पन्ना फिर खोल दिया हो। सफेद इमारतों के नीचे खुले गलियारे, पैदल चलने के लिए पर्याप्त जगह और दुकानों के सामने कम भीड़ ने कनॉट प्लेस को उसके पुराने रूप की याद दिला दी। फर्क सिर्फ इतना है कि 80 के दशक में यह इसकी रोजमर्रा की तस्वीर थी, जबकि अब अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के आगमन पर नजर आ रही है।

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था के तहत कनॉट प्लेस में अवैध रेहड़ियों और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की गई। गलियारों से अस्थायी दुकानें और रेहड़ियां हटने के बाद पैदल आवाजाही के लिए जगह खुल गई। कई स्थानों पर बैठने की जगह भी साफ नजर आ रही है।
भिखारियों और खुले में रहने वाले लोगों की मौजूदगी आम दिनों की तुलना में कम दिखाई दी। कार्रवाई के बाद कनॉट प्लेस का वह स्वरूप सामने आया, जिसे यहां के पुराने व्यापारी और दिल्लीवासी 80 के दशक की अपनी यादों से जोड़ते हैं। हालांकि, इस बदलाव ने व्यवस्था पर सवाल भी खड़े किए हैं। उनका सवाल है कि जब बड़े आयोजन के दौरान कुछ घंटों की कार्रवाई से बाजार के गलियारे खुले और व्यवस्थित किए जा सकते हैं, तो सामान्य दिनों में यही व्यवस्था क्यों कायम नहीं रह सकती?
80 के दशक का कनॉट प्लेस याद कर रहे व्यापारी
स्थानीय व्यापारियों के मुताबिक 80 के दशक में कनॉट प्लेस के गलियारे मुख्य रूप से पैदल आवाजाही के लिए खुले रहते थे। दुकानों के सामने पर्याप्त जगह होने से बाजार की गोलाकार संरचना भी स्पष्ट दिखाई देती थी। समय के साथ रेहड़ियों, अस्थायी दुकानों और अतिक्रमण के बढ़ने से यह जगह लगातार सिकुड़ती गई। कनॉट प्लेस स्थित एक कैफे संचालक शेखर का कहना है कि सम्मेलन के दौरान अगर पुराने स्वरूप को वापस लाया जा सकता है तो इसे केवल आयोजन तक सीमित रखने का कोई औचित्य नहीं है। उनके मुताबिक नियमित निगरानी और कार्रवाई से बाजार को स्थायी रूप से व्यवस्थित रखा जा सकता है।

जी-20 के बाद फिर उठा स्थायी समाधान का मुद्दा
कनॉट प्लेस के दुकानदारों का कहना है कि जी-20 सम्मेलन के दौरान भी इसी तरह अतिक्रमण हटाया गया था। तब भी कुछ दिनों तक बाजार के गलियारे खुले और साफ दिखाई दिए, लेकिन आयोजन समाप्त होने के बाद स्थिति धीरे-धीरे पहले जैसी हो गई। कनॉट प्लेस में रेहड़ी-पटरी और अतिक्रमण का मुद्दा लंबे समय से विवादित रहा है। व्यापारी संगठन इस मामले में प्रदर्शन के साथ कानूनी लड़ाई भी लड़ते रहे हैं। उनका आरोप है कि कार्रवाई के बाद कुछ समय बीतते ही गलियारों में फिर अवैध दुकानें और रेहड़ियां लौट आती हैं।

मेहमानों के लिए साफ, दिल्ली वालों के लिए भी ऐसा ही क्यों नहीं
ज्वैलरी शॉप की संचालिका मोनिका के मुताबिक अतिक्रमण से केवल बाजार की सुंदरता प्रभावित नहीं होती, बल्कि पैदल आवाजाही और सुरक्षा भी प्रभावित होती है। संकरे रास्तों में आपात स्थिति के दौरान परेशानी बढ़ सकती है। ऐसे में मांग केवल अभियान चलाने की नहीं, बल्कि नियमित निगरानी और स्थायी व्यवस्था की है। विदेशी मेहमानों के जाने के बाद अगर पुरानी स्थिति लौटती है तो सम्मेलन के दौरान किया गया पूरा बदलाव महज कुछ दिनों की कवायद बनकर रह जाएगा।
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