देहरादून- जहां 20-25 साल रहे जीत से दूर, उन अभेद्य दुर्ग को फतह करने के लिए BJP ने बनाई बड़ी रणनीति

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प्रदेश में लगातार नौ साल से सत्ता चला रही भाजपा अब जीत की हैट्रिक के लिए उन सीटों पर भी फोकस करेगी, जहां पिछले 20 या 25 साल में एक भी जीत हासिल नहीं हो सकी। इसके लिए संगठन ने बड़े स्तर की रणनीति बनाई है।

संगठन ने पिछले चुनाव में कम अंतर से जीत या हार वाली 23 सीटें चिह्नित की हैं। यहां निचले स्तर पर पांच सर्वे होंगे। एक सर्वे हो चुका है। दो सर्वे मार्च-अप्रैल में होंगे। फिर राज्य स्तर का सर्वे होगा। जब पैनल के नाम भेजे जाएंगे, तो उन पर केंद्रीय नेतृत्व अलग से सर्वे कराएगा।

 

इन सीटों पर एक जीत को तरस रही भाजपा

चकराता(देहरादून) : यह कांग्रेस की ऐसी सीट है, जिस पर भाजपा आज तक जीत दर्ज नहीं कर पाई। 2002 से 2022 तक के सभी पांच चुनावों में यहां से कांग्रेस के प्रीतम सिंह ही विधायक रहे हैं। भाजपा ने यहां कई बार प्रत्याशी बदले। यहां तक कि 2017 में केवल 1,543 वोटों के अंतर से हारी, लेकिन जीत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी।

पिरान कलियर (हरिद्वार) : परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर भी भाजपा का खाता नहीं खुल पाया है। 2012, 2017 और 2022 के चुनावों में यहां से कांग्रेस के फुरकान अहमद लगातार जीतते आ रहे हैं। ध्रुवीकरण के बावजूद यहां का जातीय और धार्मिक समीकरण भाजपा के पक्ष में नहीं बैठ पाया।

मंगलौर (हरिद्वार) : 25 साल से भाजपा यहां जीत के इंतजार में है लेकिन अभी तक नाकाम रही है। 2002, 2007, 2012 में यह सीट बसपा के पास थी। 2017 में कांग्रेस के पास आई, लेकिन 2022 में फिर बसपा के पास आ गई थी। हालांकि 2024 में हुए उपचुनाव में फिर कांग्रेस ने यहां जीत दर्ज की।

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यमुनोत्री (उत्तरकाशी) : यमुनोत्री सीट पर भाजपा का रिकॉर्ड काफी खराब रहा है। 2002 में यूकेडी, 2007 में कांग्रेस, 2012 में फिर यूकेडी और 2022 निर्दलीय विधायक बने। भाजपा को यह सीट केवल एक बार 2017 में मिली थी, जब केदार सिंह रावत विधायक बने थे। 2022 में यह सीट फिर से भाजपा के हाथ से निकल गई थी।

भगवानपुर (हरिद्वार) : वर्ष 2002 में यहां भाजपा से चंद्रशेखर जीते थे। उसके बाद से 2007 और 2012 में यह सीट बसपा के खाते में आई। फिर 2017 और 2022 में यह सीट कांग्रेस के पास है। भाजपा यहां 20 साल से जीत को तरस रही है।

धारचूला (पिथौरागढ़) : धारचूला कुमाऊं की वह सीट है, जहां भाजपा आज तक किसी भी मुख्य विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर पाई है। 2002 और 2007 में यहां से निर्दलीय उम्मीदवार गगन सिंह रजवार जीते। उसके बाद 2012, 2017 और 2022 में लगातार तीन बार से कांग्रेस के हरीश धामी यहां के विधायक हैं। यहां तक कि 2014 के उपचुनाव में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत यहां से लड़े थे, तब भाजपा को हार मिली थी।

हल्द्वानी (नैनीताल) : 20 साल से इस सीट पर भाजपा जीत से दूर है। 2002 में इंदिरा हृदयेश जीती। 2007 में भाजपा के बंशीधर भगत जीते। 2012 और 2017 में फिर इंदिरा और 2022 में कांग्रेस के ही सुमित हृदयेश ने यहां जीत दर्ज की।

त्रिकोणीय मुकाबले से जीत की उम्मीद

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि इन सभी सीटों पर हमारा जोर इस बात पर है कि त्रिकोणीय मुकाबला होगा। इससे भाजपा के लिए जीत की राह ज्यादा आसान होगी। इसकी रणनीति पर काम किया जा रहा है। संगठन ने पिछले चुनाव में कम अंतर से जीत या हार वाली 23 सीटें चिह्नित की हैं। यहां निचले स्तर पर पांच सर्वे होंगे। एक सर्वे हो चुका है। दो सर्वे मार्च-अप्रैल में होंगे। फिर राज्य स्तर का सर्वे होगा। जब पैनल के नाम भेजे जाएंगे, तो उन पर केंद्रीय नेतृत्व अलग से सर्वे कराएगा।

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