पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी का निधन, प्रदेश में शोक की लहर, लंबे समय से चल रहे थे बीमार

Spread the love

त्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी का आज निधन हो गया है। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन की खबर से पूरे प्रदेश में शोक की लहर है। उनके आवास पर लगातार पिछले कई दिनों राजनेताओं और परिजनों के आने का सिलसिला जारी था।

 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ राजनेता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी (सेवानिवृत्त) के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि जनरल खंडूड़ी ने भारतीय सेना में रहते हुए राष्ट्र सेवा, अनुशासन एवं समर्पण का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। सार्वजनिक जीवन में भी उन्होंने उत्तराखंड के विकास, सुशासन, पारदर्शिता और ईमानदार कार्यशैली की मजबूत पहचान बनाई।

 

उन्होंने प्रदेशहित में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लेकर विकास को नई दिशा प्रदान की। कहा कि खंडूड़ी की सादगी, स्पष्टवादिता एवं कार्यकुशलता सदैव प्रेरणास्रोत रहेगी। उनका निधन उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी अपूरणीय क्षति है।

आज शब्द साथ नहीं दे रहे हैं: ऋतु खंडूड़ी
पिता के निधन पर विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने कहा कि मैंने केवल अपने पिता को नहीं खोया, बल्कि अपने जीवन के सबसे बड़े संबल, मार्गदर्शक और उस व्यक्तित्व को विदा किया है जिसकी छाया में मैंने कर्तव्य, अनुशासन और सेवा का अर्थ समझा। मेजर जनरल (रि.) भुवन चंद्र खण्डूरी जी का जीवन किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की एक जीवंत गाथा था। 1 अक्टूबर 1934 को प्रारम्भ हुई उनकी जीवन यात्रा भारतीय सेना के रणक्षेत्रों से लेकर लोकतंत्र के सर्वोच्च मंचों और उत्तराखंड की जनसेवा तक पहुँची, लेकिन हर भूमिका में उनकी पहचान एक ही रही। राष्ट्र प्रथम।

और पढ़े  उत्तराखंड SIR- तीन दिन में 19 लाख लोगों तक पहुंचे गणनापत्र, चंपावत, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ सबसे आगे

1954 में भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त करने के साथ उन्होंने मातृभूमि की सेवा का जो संकल्प लिया, उसे जीवन भर निभाया। उन्होंने 1962 के भारत–चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत–पाक युद्धों में देश के लिए अपना कर्तव्य निभाया। सीमाओं पर बिताए वे वर्ष केवल एक सैनिक के साहस की कहानी नहीं थे, बल्कि उन अनगिनत त्यागों की भी कहानी थे जो एक सैनिक का परिवार मौन रहकर करता है।

जब वे सीमा पर राष्ट्र की सुरक्षा में तैनात रहते थे, तब परिवार ने भी उनके साथ एक अलग युद्ध जिया—प्रतीक्षा का, अनिश्चितता का और मौन चिंता का। हमारे बचपन के अनेक क्षण ऐसे रहे जब पिता का स्नेह पत्रों में मिलता था, उनकी उपस्थिति स्मृतियों और प्रतीक्षा में महसूस होती थी। लेकिन उन्होंने हमें कभी शिकायत नहीं, बल्कि गर्व करना सिखाया—कि राष्ट्रसेवा केवल सैनिक नहीं करता, उसका परिवार भी उस संकल्प का सहभागी होता है। सेना में लगभग छत्तीस वर्षों की गौरवपूर्ण सेवा के दौरान उन्होंने नेतृत्व, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी मिसाल स्थापित की कि 26 जनवरी 1982 को उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल  से सम्मानित किया गया। मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने विश्राम का मार्ग नहीं चुना। 1991 में सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर उन्होंने जनसेवा को अपना नया दायित्व बनाया।

गढ़वाल की जनता ने उन्हें बार-बार संसद भेजा
गढ़वाल की जनता ने उन्हें बार-बार संसद भेजा और उन्होंने सांसद, केंद्रीय मंत्री तथा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा की। भारत सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री रहते हुए उन्होंने स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना और गोल्डन क्वाड्रिलेटरल जैसी ऐतिहासिक योजनाओं को गति दी, जिसने आधुनिक भारत की विकास यात्रा को नई दिशा दी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सादगी, पारदर्शिता और सुशासन का पर्याय बना। मजबूत लोकायुक्त कानून, प्रशासनिक सुधार और जनहित को सर्वोच्च रखने का उनका आग्रह सदैव याद रखा जाएगा। लेकिन मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी पहचान किसी पद या सम्मान से नहीं थी।

और पढ़े  टिहरी: लोक गायक पवन सेमवाल सहित दो को हुई जेल, वाहन में आगजनी और अभद्रता का आरोप

 

अटल बिहारी वाजपेयी लाए थे राजनीति में 

उत्तराखंड के चौथे मुख्यमंत्री रहे भुवन चंद्र खंडूड़ी को  पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में लाए थे। ये 1990 का दौर था। खंडूड़ी सेना से रिटायर हुए थे। भुवन चंद्र खंडूड़ी की गिनती पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भरोसेमंदों में होती थी। पहली बार लोकसभा पहुंचने के दो साल के भीतर ही खंडूड़ी को पार्टी का मुख्य सचेतक बना दिया गया।

1996 के लोकसभा चुनाव में खंडूड़ी को हार का सामना करना पड़ा। 1999 में अटल बिहारी सरकार में सड़क परिवहन मंत्री बनाया गया। इस दौर में देश में सड़कों की शक्ल बदलने और हाईवे बनाने का काम हुआ जिसके लिए खंडूड़ी की आज तक प्रशंसा होती है। कहा जाता है कि वाजपेयी का खंडूड़ी पर इतना भरोसा था कि उन्हें काम करने की पूरी आजादी मिली हुई थी।

सूबे की कमान खंडूड़ी के हाथों में ही आई
17 साल बाद एक बार फिर 2007 में भाजपा को खंडूड़ी को देहरादून भेजने की जरूरत महसूस हुई। अब तक उत्तराखंड को बने सात चाल हो चुके थे और सूबे में भाजपा के अंदर गुटबाजी जोरों पर थी। मैदान में कोश्यारी एवं निशंक गुट थे और दिल्ली तक प्रदर्शन करने के बाद भी सूबे की कमान खंडूड़ी के हाथों में ही आई।

2007 से लेकर 2009 तक खंडूड़ी ने मुख्यमंत्री का पद संभाला। यह वही दौर था जब वाजपेयी के स्वास्थ्य खराब रहने लगा था और आडवाणी एवं सुषमा समेत कई बड़े नेता खंडूड़ी को हटाने के पक्ष में आए और सूबे की कमान रमेश पोखरियाल निशंक के हाथों में आ गई।

और पढ़े  नरेंद्रनगर नगर पालिका चुनाव:- 56.62% हुआ मतदान, पोलिंग बूथ पर पहुंचे कैबिनेट मंत्री का UKD ने किया विरोध

जब सूबे में भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हुए तो एक बार फिर केंद्रीय नेतृत्व को खंडूड़ी को फिर से देहरादून भेजने की जरूरत महसूस हुई और 2011 में उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बना दिया गया। साल 2014 में मोदी लहर की वजह से भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई तो खंडूड़ी को रक्षा मामलों की संसदीय समिति का अध्यक्ष बनाया गया।


Spread the love
  • Related Posts

    उद्योगपति मुकेश अंबानी ने किए बदरीनाथ के दर्शन, भगवान बदरीविशाल का लिया आशीवार्द, 5 करोड़ किए दान

    Spread the love

    Spread the loveउद्योगपति मुकेश अंबानी ने आज बदरीनाथ धाम के दर्शन किए। इस दौरान उन्होंने भगवान बदरीनाथ के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। साथ ही मंदिर समिति के लोगों से मुलाकात…


    Spread the love

    अयोध्या: राम मंदिर के चढ़ावे में गबन की जांच के लिए पीएमओ से पहुंचे अफसर, आज पहुंचेगी एसआईटी

    Spread the love

    Spread the loveराम मंदिर के चढ़ावे में गबन के मामले के तूल पकड़ने के बाद केंद्र भी सक्रिय हो गया है। रविवार को पीएमओ की तरफ से एक बड़े अफसर…


    Spread the love