छत्तीसगढ़- आखिर क्यों ? बालको प्रबंधन वेदांता के संस्थापक और बालको के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के मेहनत, शोहरत को मिट्टी में मिला देने पर आमदा है

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बालको का वर्तमान प्रबंधन वेदांता के संस्थापक और बालको के चेयरमैन अनिल अग्रवाल के मेहनत शोहरत को मिट्टी में मिला देने पर आमदा है। सन 1965 में भारत सरकार ने धातुओं की आत्मनिर्भरता को पूरा करने के लिए कोरबा में उपलब्ध एल्युमिनियम भंडार का उपयोग करने बालको की स्थापना की।देश की आवश्यकता की पूर्ति में बालको ने अपना प्रचुर योगदान दिया, 2008 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेई सरकार ने इसे निजी और सरकारी दोनों ही सहयोग से देश को निरंतर गुणवत्ता युक्त एल्युमिनियम उत्पादन के लिए वेदांत समूह को 51% शेयर के साथ शामिल कर लिया, वेदांता ग्रुप के संस्थापक अनिल अग्रवाल ने सरकार की मनसा और अपने अथक प्रयासों को जारी रखा, आज वेदांता ग्रुप की पहचान न केवल कोरबा की बल्कि विश्व में धातु निर्माण और आपूर्ति में सबसे बड़ा नाम बनकर उभर आया है, आज अनिल अग्रवाल का नाम देश के और विश्व के ख्यातिलब्ध उद्योगपतियों में शुमार किया जाता है, ये उपलब्धियां हासिल करना एक दिन का नहीं बल्कि वर्षों की मेहनत और लगन का परिणाम है।समय-समय पर बालको प्रबंधन में बहुत सारे बदलाव हुए सभी ने अपनी मेहनत का परिणाम बालको की उपलब्धियां में समाहित किया।

अब सवाल यहां पर यह उठता है की बालको जैसी नामचीन कंपनी जहां उपलब्धियां कीर्तिमान गढ़ती है वही स्थानीय लोगों में बालको के प्रति हमेशा जन आक्रोश क्यों? बना रहता है, प्रबंधन जन सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर हमेशा क्यों? बेपरवाह रहता है, हर दिन हर माह बालको के खिलाफ एक आक्रोश आंदोलन और हड़ताल की पृष्ठभूमि क्यों? तैयार होती है और सड़कों पर जन मानस मुखर होकर कर वेदांता के खिलाफ क्यों? आवाज उठाता है ,आखिर ऐसा क्यों?अब सवाल यहां पर यह उठता है की बालको जैसी नामचीन कंपनी जहां उपलब्धियां कीर्तिमान गढ़ती है वही स्थानीय लोगों में बालको के प्रति हमेशा जन आक्रोश क्यों? बना रहता है, प्रबंधन जन सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर हमेशा क्यों? बेपरवाह रहता है, हर दिन हर माह बालको के खिलाफ एक आक्रोश आंदोलन और हड़ताल की पृष्ठभूमि क्यों? तैयार होती है और सड़कों पर जन मानस मुखर होकर कर वेदांता के खिलाफ क्यों? आवाज उठाता है ,आखिर ऐसा क्यों?

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वेदांता के प्रबंधन ने क्या तय कर लिया है कि चेयरमैन अनिल अग्रवाल की शोहरत और उनकी छवि को चोट पहुंचाना ही है, बालको संयंत्र का चलना जितना देश हित में है उतना ही आम जन की सुविधा और उनकी जोखिम का ध्यान रखना प्रबंधन की जवाबदारी है।

कोरबा का हर आम आदमी चिमनी हादसे में हुए 40 लोगों की मौत का दर्द अभी भी नहीं भूल पाया है और अब प्रतिदिन ध्यानचंद चौक से लेकर बालको तक का सफर जान हथेली पर लेकर करता है अपनी आपबीती ये गंतव्य तक पहुंचा राही ही बता सकता है। दैत्याकार वाहनों की लंबी कतार, राख और धूल का गुबार, गड्ढों का भरमार ,कैसे पार हुआ जाता है किसी से छुपा नहीं है, अनगिनत सड़क दुर्घटनाओं के लिए बालको प्रबंधन की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, जिला प्रशासन को बालको प्रबंधन को नियमित सड़क के रखरखाव, पानी का छिड़काव, ट्रकों से गिरे राख का उठाव के लिए सख्त निर्देश देना चाहिए, बालको अपने हितों के लिए आम लोगों की जान जोखिम में नहीं डाल सकती,अखबारों,इलेक्ट्रानिक चैनलों,न्यूज पोर्टलों में विज्ञप्ति भेज कर जनसरोकार की फोटो छपवाकर अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की जगह हकीकत के भी दर्शन कराए और संवेदनशील सहृदय उद्योगपति अनिल अग्रवाल के परोपकारी छवि पर बट्टा न लगाए।


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