पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद पिछले 54 दिनों के भीतर राज्य की राजनीति तेजी से बदली है। नई सरकार ने एक तरफ चुनावी वादों को पूरा करने की शुरुआत की, वहीं दूसरी ओर पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान बनी कई व्यवस्थाओं में बड़े बदलाव किए। इस दौरान तृणमूल नेताओं का पाला बदलना, ममता के विधायक और सांसदों का टूटना सुर्खिया में रहा। इतना ही नहीं गिरफ्तारियां, अवैध कब्जों पर बुलडोजर कार्रवाई, सीमा सुरक्षा, अवैध प्रवासियों के खिलाफ अभियान और कई नई योजनाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी। हालांकि अब तृणमूल नेताओं पर अंडे फेंकने और विरोध प्रदर्शन की घटनाएं भी सुर्खियों में हैं।
वहीं तृणमूल कांग्रेस इस दावे को पूरी तरह खारिज करती है। पार्टी का आरोप है कि उसके नेताओं को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। तृणमूल का कहना है कि विरोध के नाम पर राजनीतिक हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है और विपक्षी नेताओं को डराने की कोशिश की जा रही है।
क्या महुआ मोइत्रा पर हमले के बाद भाजपा और तृणमूल आमने-सामने आ गए?
महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनके कार्यक्रम के दौरान अंडे फेंके और गो बैक के नारे लगाए। उन्होंने इस घटना का वीडियो भी साझा किया। उन्होंने यह भी कहा कि वो इस मामले में कानूनी कार्रवाई करेंगी। जरूरत पड़ी तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी जाएंगी।
इसके बाद तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों पर हमला लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। उन्होंने पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि सत्ता हमेशा स्थायी नहीं रहती।
दूसरी ओर पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि तृणमूल के भीतर आंतरिक संघर्ष चल रहा है और टीएमसी ही टीएमसी पर हमला कर रही है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि पुलिस अंडे लेकर चलने वालों की पहचान कैसे करेगी, क्योंकि इसके लिए कोई मशीन नहीं होती। भाजपा का कहना है कि राज्य की छवि खराब करने के बजाय तृणमूल को अपने संगठन के भीतर झांकना चाहिए।
अभिषेक बनर्जी पर कब हुआ था हमला?
30 मई को तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी जब सोनारपुर में कथित चुनाव बाद हिंसा से प्रभावित परिवारों से मिलने पहुंचे थे, तब उनके काफिले के पास कथित तौर पर अंडे और पत्थर फेंके गए। इस दौरान धक्का-मुक्की और नारेबाजी भी हुई, जिसमें अभिषेक बनर्जी को मामूली चोट लगने की बात सामने आई। घटना के बाद उन्होंने इसे राजनीतिक हिंसा और राज्य प्रायोजित आतंक करार दिया। वहीं भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह जनता के विरोध का परिणाम था।
बीते कुछ समय में किन-किन तृणमूल नेताओं पर अंडे फेंके गए?
पिछले कुछ सप्ताह में कई प्रमुख तृणमूल नेताओं के साथ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं। सबसे पहले 30 मई को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान कथित रूप से अंडे और पत्थर फेंके गए। इसके बाद 13 जून को कृष्णानगर में सांसद महुआ मोइत्रा पर अदालत परिसर के बाहर विरोध प्रदर्शन हुआ। हाल ही में नदिया जिले के पलाशी में पार्टी कार्यक्रम के दौरान भी महुआ मोइत्रा पर कथित रूप से अंडे फेंके गए और उनके खिलाफ नारेबाजी हुई।
इसी तरह 15 जून को तृणमूल नेता कुणाल घोष पर कोलकाता स्थित ममता बनर्जी के आवास के बाहर अंडे फेंके गए। इसके अलावा युवा नेता सौमित्र बनर्जी पर भी पुलिस हिरासत के दौरान अंडे फेंके जाने की घटना सामने आई। इन घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी है कि बंगाल में विरोध प्रदर्शन का तरीका तेजी से बदल रहा है।
क्या यह वास्तविक जनाक्रोश है या राजनीतिक हिंसा का नया स्वरूप?
इन घटनाओं को दो अलग-अलग नजरियों से देखा जा रहा है। भाजपा इसे जनता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया बता रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि यह विपक्षी दलों द्वारा माहौल बिगाड़ने की कोशिश है। लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने यह जरूर संकेत दिया है कि सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक माहौल पहले जैसा नहीं रहा।
हालांकि यह भी सच है कि केवल कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे राज्य की जनता की भावना का निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए इन घटनाओं को लेकर दोनों दल अपनी-अपनी राजनीतिक व्याख्या कर रहे हैं और आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक चर्चा में रह सकता है।
सियासी बयार में बदलाव पर भाजपा और तृणमूल की दलीलें क्या?
भाजपा का कहना है कि नई सरकार ने सत्ता संभालते ही भ्रष्टाचार, अवैध कब्जों, सिंडिकेट राज और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर कार्रवाई शुरू कर दी है। पार्टी का दावा है कि जनता इसी बदलाव के पक्ष में खड़ी है और विरोध की घटनाएं उसी माहौल का हिस्सा हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि अब प्रशासन निष्पक्ष तरीके से काम कर रहा है और कानून सभी पर समान रूप से लागू किया जा रहा है।
वहीं तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि नई सरकार राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रही है। पार्टी का कहना है कि उसके नेताओं की गिरफ्तारियां, विरोध प्रदर्शन और हमले लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ठीक संकेत नहीं हैं। तृणमूल का दावा है कि जनता आने वाले समय में इन घटनाओं का जवाब लोकतांत्रिक तरीके से देगी। फिलहाल बंगाल की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। हालांकि ये जरूर देखना ऐसी घटनाओं पर सरकार कितनी सख्त है? और वो क्या कार्रवाई करेगी?
सत्ता परिवर्तन के बाद सबसे सरकार के बड़े फैसले कौन-कौन से रहे?
- राज्य में आयुष्मान भारत योजना लागू करने का फैसला।
- पीएम फसल बीमा योजना, पीएम विश्वकर्मा, उज्ज्वला योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और पीएम सूर्य घर योजना लागू करने की प्रक्रिया शुरू।
- अन्नपूर्णा योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने आर्थिक सहायता देने का फैसला।
- वृद्धावस्था, विधवा और दिव्यांग पेंशन की राशि बढ़ाई गई।
- महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा लागू।
- जनता की शिकायतें सुनने के लिए जनता दरबार कार्यक्रम शुरू किया गया।
सीमा सुरक्षा और अवैध प्रवासियों पर सरकार ने क्या कदम उठाए?
- भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी का काम तेज करने का फैसला।
- लंबित भूमि हस्तांतरण प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की पहल।
- अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए अभियान शुरू।
- होल्डिंग सेंटरों की व्यवस्था मजबूत की गई।
- सीमा क्षेत्रों में प्रशासनिक निगरानी और सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय पर जोर।
क्या प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर भी बड़े बदलाव किए गए?
- सरकारी नौकरियों के लिए अधिकतम आयु सीमा बढ़ाई गई।
- सातवें वेतन आयोग के गठन की प्रक्रिया शुरू।
- सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य किया गया।
- यह निर्देश मान्यता प्राप्त मदरसों तक भी लागू किया गया।
- धर्म आधारित आर्थिक सहायता योजनाएं समाप्त करने का फैसला।
- आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए छात्रवृत्ति व्यवस्था मजबूत करने की घोषणा।
क्या अवैध निर्माण और सिंडिकेट राज पर भी कार्रवाई हुई?
- कई शहरों में अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया गया।
- कोलकाता समेत कई जगहों पर अवैध इमारतें गिराई गईं।
- रेलवे स्टेशनों के आसपास अतिक्रमण हटाया गया।
- कथित सिंडिकेट राज, रंगदारी और अवैध वसूली के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई।
- कई तृणमूल नेताओं और नगर निकायों से जुड़े लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई।
- कई नेताओं की गिरफ्तारी भी हुई।
क्या बंगाल की पहचान से जुड़े प्रतीकों में भी बदलाव हुआ?
- सरकारी दस्तावेजों और कार्यालयों से ‘बिस्वा बांग्ला’ लोगो हटाकर अशोक स्तंभ का इस्तेमाल शुरू।
- ओबीसी आरक्षण व्यवस्था में संशोधन की प्रक्रिया शुरू।
- ‘मां आहार’ योजना के तहत सस्ती दर पर भोजन देने की घोषणा।
- अवैध पशु वध और सार्वजनिक बूचड़खानों पर सख्ती बढ़ाई गई।
सत्ता परिवर्तन के बाद कितनी कमजोर हुई ममता की तृणमूल?
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका संगठन के भीतर से लगा। सरकार बदलने के बाद पार्टी सिर्फ सत्ता से बाहर नहीं हुई, बल्कि उसे लगातार टूट का भी सामना करना पड़ा। फिर चाहे वो संसद में हो या विधानसभा में। बीते 54 दिनों में कई बड़े चेहरे तृणमूल से अलग हुए, जिससे ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ पर सवाल भी उठने लगे।
लोकसभा में तृणमूल के पास पहले 28 सांसदथे, लेकिन इनमें से 20 सांसद पार्टी से अलग हो चुके हैं। अब लोकसभा में पार्टी के पास केवल आठ सांसद बचे हैं। वहीं राज्यसभा में भी 13 में से 4 सांसदों के इस्तीफे के बाद तृणमूल की संख्या घटकर 9 रह गई है। विधानसभा में भी स्थिति पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण बन गई है। हालिया चुनाव में तृणमूल के 80 विधायक चुने गए थे, लेकिन इनमें से 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया है। इसके बाद ममता बनर्जी के साथ केवल 22 विधायक ही बचे हैं। ऐसे में पार्टी को संगठन, सदन और राजनीतिक प्रभाव तीनों स्तरों पर अब तक की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा।
तृणमूल में टूट की पांच बड़ी वजह
- विधानसभा चुनाव में हार
चुनावी हार के बाद पार्टी के नेतृत्व और रणनीति पर सवाल उठने लगे। कई नेताओं ने संगठन को हार के लिए जिम्मेदार ठहराया।
- अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व का विरोध
पार्टी के एक वर्ग का आरोप है कि फैसले कुछ नेताओं तक सीमित हो गए हैं। बागी गुट अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर सवाल उठा रहा है।
- विपक्ष के नेता के चयन पर विवाद
नेता प्रतिपक्ष के नाम को लेकर ममता गुट और बागी गुट अलग-अलग उम्मीदवारों के समर्थन में आ गए, जिससे अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आ गए।
- हस्ताक्षर फर्जीवाड़ा विवाद
नेता प्रतिपक्ष के चयन से जुड़े कथित फर्जी हस्ताक्षर के मामले ने पार्टी के अंदरूनी विवाद को कानूनी और राजनीतिक संकट में बदल दिया।
- संगठन में लंबे समय से असंतोष
कई विधायक और सांसद पहले से ही नेतृत्व और संगठन से नाराज थे। चुनावी हार के बाद यही असंतोष खुली बगावत में बदल गया।
तृणमूल में टूट पर क्या बोले विश्लेषक?
- समीर चौगांवकर: उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी में बगावत और नेताओं के अलग होने से संगठन पर दबाव बढ़ा है।
- विनोद अग्निहोत्री: उनका मानना है कि क्षेत्रीय दलों के टूटने की बड़ी वजह उनका परिवार केंद्रित हो जाना है। उन्होंने कहा कि जब कोई पार्टी सत्ता से बाहर होती है, तो सत्ता पक्ष का दबदबा बढ़ जाता है और ऐसे समय में दल-बदल की घटनाएं तेज हो जाती हैं। उनके मुताबिक तृणमूल की स्थिति भी इसी व्यापक राजनीतिक बदलाव का हिस्सा है।








