लालकुआं क्षेत्र में प्लास्टिक कचरे से बनीं सड़कों पर दौड़ रहे वाहन, 20 KM से ज्यादा में हो चुका है काम

Spread the love

 

 

क्षिण भारत की तर्ज पर शहर में भी सड़क निर्माण में प्लास्टिक कचरे के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है। कालाढूंगी से लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में 20 किलोमीटर से अधिक सड़कें इस तकनीक से बनाई गई हैं। इन सड़कों पर यातायात भी शुरू हो गया है। विभाग का दावा है कि इस तकनीक से बनीं सड़कें टिकाऊ रहेंगी।

 

10 वर्ष पहले दक्षिण भारत में प्लास्टिक कचरे से सड़क बनाने की तकनीक का इस्तेमाल किया गया। प्लास्टिक के निस्तारण में प्रयोग मददगार बना। धीरे-धीरे इस तकनीक को अन्य राज्यों ने भी अपनाया। इसी क्रम में हल्द्वानी लोक निर्माण विभाग ने जिले में पहली बार इस तकनीक का प्रयोग कालाढूंगी और लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में किया है। कोटाबाग ब्लॉक के ग्रामीण क्षेत्रों के साथ हल्द्वानी ब्लॉक के गौलापार व बिंदुखत्ता में भी प्लास्टिक कचरे की तकनीक से सड़कें चकाचक कर दी गई हैं।

 

कहां कितने किलोमीटर सड़कों का निर्माण

कालाढूंगी विधानसभा-
देवीपुरा से विजय आतंरिक मार्ग 2.58 किमी
चिंतपुर से रूपपुर आतरिंग मार्ग 860 मीटर

लालकुआं विधानसभा-
तिवारीनगर-गांधीनगर बिंदुखत्ता का आतंरिक मार्ग 4.28 किमी
गौलापार में आतंरिक मार्ग 8.56 किमी

कौन सा प्लास्टिक होता है इस्तेमाल
सड़क निर्माण के लिए हर तरह के प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल कर तैयार किया जाता है। इसमें प्लास्टिक के टुकड़े-टुकड़े किए जाते हैं। यह प्रक्रिया अपशिष्ट प्रबंधन में कारगर है। पर्यावरण के लिहाज से भी यह फायेदमंद है। बताया कि मध्यप्रदेश में इसका उत्पादन अधिक होता है। ठेकेदार इसकी आपूर्ति गाजियाबाद समेत अन्य शहरों से कर रहे हैं।

इस तरह बनती है सड़क
लोनिवि के इंजीनियरों के अनुसार एग्रीगेट यानी रोड़ी को गर्म करने के बाद श्रेडिंग प्लास्टिक डाला जाता है। इसके बाद गर्म बिटुमिन (डामर) में मिलाया जाता है। अनुमान के मुताबिक 25 किलो डामर में सवा दो किलो प्लास्टिक मिलाया जाता है। इस विधि से औसतन एक किलोमीटर सड़क बनाने में 12.88 लाख रुपये का खर्च आता है।

पहले प्लास्टिक कचरे वाली सड़कें कम बनती थीं लेकिन अब इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। सड़क की सुरक्षा के लिहाज से भी यह तकनीक फायदेमंद है। अभी ग्रामीण क्षेत्रों के मार्ग इस विधि से बनाए जा रहे हैं।
– प्रत्यूष कुमार, अधिशासी अभियंता लोनिवि

और पढ़े  आग के बादल होते क्या हैं,जिनकी वजह से दहल रहे यूरोप के जंगल, ये कितने घातक

Spread the love
  • Related Posts

    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग- 1 वर्षीय पोस्टग्रेजुएट कोर्स को मिली हरी झंडी, ऑनलाइन पढ़ाई का भी मिलेगा विकल्प

    Spread the love

    Spread the loveविश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने पात्र उच्च शिक्षण संस्थानों को ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग (ODL) और ऑनलाइन माध्यम से एक वर्षीय स्नातकोत्तर (PG) कार्यक्रम शुरू करने की अनुमति…


    Spread the love

    2026 सावन आज से शुरू, जानिए शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने का महत्व और कब है सावन शिवरात्रि

    Spread the love

    Spread the loveहिंदू कैलेंडर के अनुसार सावन साल का पांचवां महीना होता है। श्रावण माह में शिव जी की पूजा-उपासना का विशेष महत्व होता है। आज से सावन का महीना…


    Spread the love