थराली और धराली में आई आपदा के बाद से पहाड़ी क्षेत्रों में संभावित खतरों को देखते हुए उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) और अल्मोड़ा जिला प्रशासन की ओर से अल्मोड़ा का विस्तृत भूगर्भीय सर्वेक्षण शुरू किया है। वैज्ञानिक दल जिले की धरातलीय परिस्थितियों, नदियों के आसपास बसे क्षेत्रों और भूस्खलन प्रभावित स्थानों का वैज्ञानिक अध्ययन कर रहा है। प्रदेश में इस विशेष अध्ययन के लिए अल्मोड़ा जनपद का चयन किया गया है।
यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो दुर्गेश पंत ने कहा कि अल्मोड़ा जिले के सफल अध्ययन के बाद यह अध्ययन पूरे उत्तराखंड में किया जाएगा। भविष्य में उत्तराखंड को नेपाल जैसी त्रासदी का सामना न करना पड़े इसके लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। यूकॉस्ट की ओर से इस प्रकार के अध्ययनों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
रामगंगा किनारे 801 संरचनाएं पुराने बाढ़ मैदान में
अध्ययन के प्रारंभिक निष्कर्षों के अनुसार रामगंगा नदी के हालिया बाढ़ मैदान (आरएफपी) में 91 और पुराने बाढ़ मैदान यानी टी-1 क्षेत्र में 801 संरचनाएं चिन्हित हुईं। जोखिम आकलन में इनमें 233 संरचनाएं उच्च और 568 मध्यम जोखिम श्रेणी में पाई गईं। वहीं कोसी नदी के आरएफपी क्षेत्र में 15 और टी-1 क्षेत्र में 441 संरचनाएं चिन्हित की गईं। इनमें 23 उच्च और 418 मध्यम जोखिम श्रेणी में हैं।
नदियों के किनारे निर्माण पर नजर रखने की जरूरत
अध्ययन में गगास नदी के आरएफपी क्षेत्र में 40 और साई नदी के आरएफपी क्षेत्र में 11 संरचनाएं भी दर्ज की गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये आंकड़े सक्रिय नदी चैनलों और बाढ़ मैदानों के नजदीक बसी आबादी एवं बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता को सामने रखते हैं।
भूस्खलन के कारणों की होगी जांच
वैज्ञानिक दल हाल के दिनों में जिले के विभिन्न हिस्सों में हुए भूस्खलनों के मूल कारणों का भी अध्ययन करेगा। इसके तहत भूगर्भीय परिस्थितियों, भूमि की स्थिति और अन्य संभावित कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर दीर्घकालिक समाधान तलाशने का प्रयास किया जाएगा।
खतरे से पहले मिलेगा अलर्ट
सर्वेक्षण के बाद तैयार विस्तृत रिपोर्ट जिला प्रशासन को सौंपी जाएगी। संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की योजना है। यानी भविष्य में पहाड़ खिसकने या अन्य प्राकृतिक खतरे की आशंका होने पर लोगों को समय रहते चेतावनी मिल सकेगी। परियोजना के तहत तैयार मानचित्र और स्थानीय डाटाबेस का उपयोग संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों के नियमन, जल निकासी व्यवस्था में सुधार, नदी कटाव वाले क्षेत्रों की निगरानी और आपदा प्रबंधन की रणनीति तैयार करने में किया जा सकेगा।






