दिल्ली का हाल:- 16 साल में 110 जिंदगियां ले चुकी हैं जर्जर इमारतें, हर हादसे पर होता है हंगामा फिर ‘बत्ती गुल’

दिल्ली में जर्जर और अवैध इमारतें लगातार जानलेवा साबित हो रही हैं। वर्ष 2010 से 2026 तक ऐसे हादसों में करीब 110 लोगों की जान जा चुकी है। हर बड़े हादसे के बाद सरकारी एजेंसियों ने सर्वे, जांच, नोटिस और कार्रवाई का दावा किया, लेकिन कुछ समय बाद ही शहर में अवैध निर्माण और कमजोर इमारतों का सिलसिला फिर शुरू हो गया। हादसे बताते हैं कि समस्या सिर्फ जर्जर भवनों की नहीं, बल्कि उन्हें समय रहते चिन्हित करने और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने वाली निगरानी व्यवस्था की  भी है।

इन हादसों की पड़ताल में भवन मालिकों, बिल्डरों और ठेकेदारों की लापरवाही के मामले सामने आते रहे हैं। कहीं बिना अनुमति निर्माण हुआ, कहीं पुरानी इमारत में अतिरिक्त मंजिल खड़ी कर दी गई, तो कहीं पड़ोसी प्लॉट में गहरी खुदाई से नींव कमजोर हो गई। कई मामलों में खतरनाक घोषित भवनों में भी मरम्मत या निर्माण कार्य जारी रहने की बात सामने आई। इसके बावजूद संबंधित एजेंसियां समय रहते खतरे को रोकने में नाकाम रहीं।
शिक्षक से लेकर इंजीनियर ने गंवाई जान
इन हादसों में मरने वालों की सूची सिर्फ निर्माण मजदूरों तक सीमित नहीं रही। बच्चे, महिलाएं, मजदूर, शिक्षक, छात्र, डॉक्टर, इंजीनियर और आम परिवारों के लोग भी इन त्रासदियों का शिकार हुए हैं।
कई घटनाओं में ऐसे लोग मारे गए, जिनका निर्माण गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं था और जो सिर्फ अपने घर या कार्यस्थल में मौजूद थे।

इससे सवाल और गंभीर हो जाता है कि भवन सुरक्षा को लेकर नियम और निगरानी व्यवस्था होने के बावजूद खतरे वाली इमारतों तक कार्रवाई क्यों नहीं पहुंच पाती। जब अवैध निर्माण, अतिरिक्त मंजिल या नींव से छेड़छाड़ दिखाई देने के बावजूद समय पर रोक नहीं लगती, तो हादसा केवल दुर्घटना नहीं रह जाता। यह निगरानी, प्रवर्तन और जवाबदेही की विफलता का मामला बन जाता है।

दिल्ली में जर्जर और अवैध इमारतों पर कार्रवाई का दावा तभी विश्वसनीय होगा, जब सर्वे और नोटिस के बाद वास्तविक कार्रवाई भी दिखे और लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो। वरना हर नए हादसे के बाद जांच और कार्रवाई के पुराने वादे दोहरते रहेंगे और मौतों का आंकड़ा बढ़ता रहेगा।

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हादसों का पैटर्न भी लगभग एक जैसा
हादसों का पैटर्न भी लगभग एक जैसा रहा है। अनधिकृत मंजिल, बिना अनुमति निर्माण, पुरानी और कमजोर संरचना, बेसमेंट का निर्माण, आसपास गहरी खोदाई, घटिया निर्माण सामग्री और निगरानी की कमी-इनमें से एक या कई कारण बार-बार सामने आए। यानी हादसे अचानक जरूर हुए, लेकिन उनके पीछे खतरे के संकेत अक्सर पहले से मौजूद थे। हर घटना के बाद जिम्मेदारी तय करने, भवनों का सर्वे कराने और खतरनाक संपत्तियों को खाली कराने की घोषणाएं हुईं। लेकिन कार्रवाई की निरंतरता पर सवाल बने रहे। यही वजह है कि एक हादसे की जांच पूरी होने से पहले दूसरे इलाके से इमारत गिरने की खबर सामने आ जाती है।

दिल्ली में बड़े हादसे
वर्ष                      स्थान                          मौतें       
 

  • 2010    ललिता पार्क, लक्ष्मी नगर                 71
  • 2011    चांदनी महल/जामा मस्जिद               07
  • 2014    इंद्रलोक, तुलसी नगर                      10
  • 2020    भजनपुरा                                      05
  • 2022    सत्य निकेतन                                 02
  • 2025    वेलकम, जनता कॉलोनी                   06
  • 2026    सैदुल्लाजाब                                   06
  • 2026    रोहिणी सेक्टर-16                           03
  • 2026    सत्य  निकेतन                                06
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