श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के अग्रणी संत, पूर्व सांसद एवं साकेतवासी महंत ब्रह्मचारी विश्वनाथ दास शास्त्री की 11वीं पुण्यतिथि पर श्रीरामानंद आश्रम दर्शन भवन, जानकीघाट में आयोजित दो दिवसीय पुण्यतिथि महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और संत परंपरा के वातावरण में संपन्न हुआ। समापन अवसर पर अयोध्या के संत-महंतों ने उनके चित्र एवं प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी और श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में उनके योगदान को स्मरण किया।
पुण्यतिथि की पूर्व संध्या पर आश्रम परिसर में ठाकुरजी को भव्य रूप से सुसज्जित झूले पर विराजमान कर झूलनोत्सव का शुभारंभ किया गया। अयोध्या के विभिन्न मंदिरों से पहुंचे संत-महंतों ने ठाकुरजी को झूला झुलाया। इस दौरान आश्रम परिसर भजन, कीर्तन और संतवाणी से देर तक गुंजायमान रहा। श्रद्धालुओं ने भी झूलनोत्सव में शामिल होकर ठाकुरजी के दिव्य स्वरूप का दर्शन किया।
इस अवसर पर महंत डॉ. ममता शास्त्री ने कहा कि महंत विश्वनाथ दास शास्त्री का जीवन धर्म, समाज और श्रीराम जन्मभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक रहा। उन्होंने कहा कि रामजन्मभूमि आंदोलन के महत्वपूर्ण दौर में विश्वनाथ दास शास्त्री ने संत समाज और रामभक्तों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी भूमिका निभाई। श्रीरामानंद आश्रम दर्शन भवन भी आंदोलन से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण गतिविधियों और तैयारियों का केंद्र रहा।
उन्होंने कहा कि यह स्थान जगद्गुरु रामानंद भगवान की पावन परंपरा से जुड़ा है। मान्यता है कि अपनी यात्रा के दौरान जगद्गुरु रामानंद भगवान ने अयोध्या के इसी स्थान पर प्रवास किया था। ऐसे पावन स्थल पर महंत विश्वनाथ दास शास्त्री की पुण्यतिथि मनाया जाना उनकी संत परंपरा और अयोध्या की आध्यात्मिक विरासत से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
संत-महंतों ने कहा कि विश्वनाथ दास शास्त्री ने संत जीवन की मर्यादा के साथ श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका संघर्ष, त्याग और रामभक्ति अयोध्या के संत समाज और रामभक्तों के लिए सदैव प्रेरणादायी रहेगा। पुण्यतिथि महोत्सव के दौरान पूरा आश्रम परिसर श्रद्धा और स्मृतियों से सराबोर रहा।





