अमेरिका और इस्राइल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अब इटली पर भी निशाना साधा है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने इटली पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि एक ओर इटली यह दावा कर रहा है कि उसने ईरान के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया, वहीं दूसरी ओर वह “तकनीकी और लॉजिस्टिक सहायता” देने की बात स्वीकार कर रहा है। ईरान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है।
ईरान ने इटली पर क्या आरोप लगाए हैं?
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- इटली एक तरफ सार्वजनिक रूप से हमलावरों की मदद से इनकार कर रहा है। जबकि दूसरी ओर तकनीकी और लॉजिस्टिक सहयोग देने की बात स्वीकार कर रहा है।
- यह गंभीर अंतरराष्ट्रीय गलत कार्रवाई में शामिल होने जैसा है। तकनीकी और लॉजिस्टिक सहायता देना अवैध युद्ध को सीधे समर्थन देने के बराबर है। ऐसी सहायता संयुक्त राष्ट्र चार्टर की भावना के भी खिलाफ है।
इटली ने अपने बचाव में क्या कहा है?
इससे पहले इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से टेलीफोन पर बातचीत की थी। तजानी ने स्पष्ट किया कि इटली ने कभी भी ईरान के खिलाफ किसी सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लिया है। उन्होंने कहा कि इटली ने अपने किसी भी सैन्य अड्डे को ईरान के खिलाफ युद्ध संबंधी कार्रवाई के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने कहा कि यह फैसला अमेरिका के साथ हुई संधियों का पूरी तरह सम्मान करते हुए लिया गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर इटली की क्या चिंता है?
इटली के विदेश मंत्री ने बातचीत के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि कई इतालवी मालवाहक जहाज अभी भी इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं, इसलिए समुद्री मार्ग को सामान्य करना जरूरी है। तजानी ने कहा कि तेहरान में इटली के दूतावास को फिर से खोलना संवाद की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है और इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक तथा सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
क्या पश्चिम एशिया में कूटनीतिक तनाव और बढ़ सकता है?
ईरान और इटली के बीच बयानबाजी ऐसे समय में सामने आई है, जब पश्चिम एशिया पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति का सामना कर रहा है। अमेरिका और इस्राइल की भूमिका को लेकर ईरान लगातार कड़े बयान दे रहा है। ऐसे में इटली पर लगाए गए ताजा आरोपों से क्षेत्रीय कूटनीतिक तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विवाद को जल्द सुलझाया नहीं गया, तो इसका असर क्षेत्रीय व्यापार और समुद्री सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।






