अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी संघीय व्यापार अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए नए वैश्विक आयात शुल्क को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने 1974 के ट्रेड एक्ट के तहत मिली सीमित शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया और कानून से बाहर जाकर 10 प्रतिशत आयात अधिभार (इंपोर्ट सरचार्ज) लगाने की कोशिश की।
व्यापार अधिनियम कानून क्यों बनाया गया था?
अमेरिकी कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने 2-1 के फैसले में कहा कि ट्रंप प्रशासन 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का इस्तेमाल व्यापक व्यापार घाटे और चालू खाता घाटे के आधार पर नहीं कर सकता। अदालत के मुताबिक, यह कानून 1970 के दशक की विशेष बैलेंस ऑफ पेमेंट्स यानी भुगतान संतुलन संकट से निपटने के लिए बनाया गया था, न कि आधुनिक दौर के सामान्य व्यापार घाटे के लिए।
ट्रंप क्या साबित करने में विफल रहे?
जज मार्क ए. बार्नेट और क्लेयर आर. केली ने अपने फैसले में कहा कि ट्रंप की घोषणा यह साबित करने में विफल रही कि कानून के जरिए आवश्यक शर्तें पूरी हुई हैं। बता दें कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फरवरी में ये टैरिफ लगाए थे।
अदलात ने क्या दी चेतावनी?
अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि अगर राष्ट्रपति को इतनी व्यापक व्याख्या की अनुमति दे दी जाए, तो उन्हें लगभग असीमित टैरिफ लगाने की शक्ति मिल जाएगी। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना संवैधानिक सवाल खड़ा कर सकता है, क्योंकि टैरिफ और व्यापार नीति तय करने का अधिकार मुख्य रूप से कांग्रेस के पास है।
ट्रंप के पुराने टैरिफ को कोर्ट ने किया था खारिज
दरअसल, इस साल की शुरुआत में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की पहले वाली टैरिफ व्यवस्था को भी खारिज कर दिया था, जिसे उन्होंने आपातकालीन शक्तियों वाले कानून के तहत लागू किया था। इसके बाद फरवरी में ट्रंप ने धारा 122 का इस्तेमाल करते हुए नया टैरिफ लागू किया। यह प्रावधान राष्ट्रपति को अधिकतम 150 दिनों के लिए 15 प्रतिशत तक अस्थायी आयात शुल्क लगाने की अनुमति देता है।
ट्रंप प्रशासन ने दावा किया था कि अमेरिका के बड़े व्यापार घाटे को देखते हुए यह कदम जरूरी है। हालांकि अदालत ने कहा कि कानून में जिस बैलेंस ऑफ पेमेंट्स क्राइसिस की बात की गई है, उसका मतलब मौजूदा व्यापार घाटे से नहीं है।
कैसे आया यह मामला सामने?
यह मामला दो आयातक कंपनियों बर्लेप और बैरल और खिलौना कंपनी बेसिक फन के साथ-साथ वॉशिंगटन राज्य द्वारा अदालत में चुनौती दिए जाने के बाद सामने आया। अदालत ने इनके पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि कुछ अन्य डेमोक्रेटिक राज्यों की याचिकाएं तकनीकी आधार पर खारिज कर दी गईं।
इस फैसले पर जज टिमोथी स्टैन्स्यू ने असहमति जताई। उनका कहना था कि अदालत को राष्ट्रपति के आर्थिक फैसलों में दखल नहीं देना चाहिए और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स की बहुत संकीर्ण व्याख्या नहीं करनी चाहिए।
अब इस फैसले को अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट में चुनौती दिए जाने की संभावना है और मामला दोबारा सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले टैरिफ खारिज किए जाने के बाद ट्रंप ने व्हाइट हाउस में नाराजगी जताते हुए कहा था, हम आगे बढ़ते रहेंगे। हम ज्यादा पैसा लाने में सफल होंगे। ट्रंप ने धारा 122 को अपने पास मौजूद बहुत शक्तिशाली विकल्पों में से एक बताया था।
ट्रंप पर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज
इस बीच ट्रंप की कार्यकारी शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस भी तेज हो गई है। कई आलोचकों, यहां तक कि कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने भी कहा है कि टैरिफ लगाने का संवैधानिक अधिकार कांग्रेस के पास है, न कि व्हाइट हाउस के पास। सीनेट में रिपब्लिकन नेता मिच मैककोनेल पहले ही कह चुके हैं कि कांग्रेस को दरकिनार कर आपातकालीन शक्तियों के जरिए टैरिफ लागू करना गैरकानूनी है।







