पिछले साल के क्या रहे आंकड़े?
गौरतलब है कि 2025-26 में पहले प्रदूषण नियंत्रण के लिए 853.9 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसे बाद में बढ़ाया गया, लेकिन वास्तविक खर्च महज ₹16 करोड़ रह गया। इससे न केवल प्राथमिकताओं पर, बल्कि जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन पर भी सवाल खड़े होते हैं।
यह कटौती ऐसे समय में आई है जब भारत भीषण गर्मी, शहरी बाढ़, तेज चक्रवात और लंबे समय तक खतरनाक वायु गुणवत्ता जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसके बावजूद पर्यावरण संरक्षण और जलवायु कार्रवाई पर सरकारी जोर सीमित नजर आता है।
पर्यावरण मंत्रालय का बजट बढ़ा, लेकिन आधार कमजोर
2026-27 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को ₹3,759.46 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जो 2025-26 के बजट अनुमान ₹3,481.61 करोड़ से करीब ₹278 करोड़ (लगभग 8%) अधिक है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ोतरी प्रतिशत के लिहाज से ठीक दिखती है, लेकिन जलवायु जोखिम, पारिस्थितिक क्षरण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को देखते हुए कुल राशि नाकाफी है।
खर्च का पैटर्न और क्रियान्वयन की चुनौती
पूंजीगत खर्च ₹174.39 करोड़ से बढ़कर ₹222.80 करोड़ हो गया है, जिससे शोध ढांचे और पर्यावरण निगरानी प्रणालियों को मजबूती मिल सकती है। लेकिन राजस्व खर्च में मामूली बढ़ोतरी ही हुई है, जो मुख्य रूप से मौजूदा संस्थानों और योजनाओं को चलाए रखने तक सीमित है।
कुछ संस्थागत मजबूती जरूर दिखती है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण जैसी इकाइयों को अधिक आवंटन मिला है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को भी अतिरिक्त फंड दिया गया है, जो बढ़ते पर्यावरणीय मुकदमों और राज्यों पर बढ़ते प्रवर्तन बोझ को दर्शाता है।