आज से ठीक 76 वर्ष पूर्व, 22-23 दिसंबर 1949 की आधी रात अयोध्या के तत्कालीन विवादित परिसर में भगवान रामलला का प्राकट्य हुआ था। यह घटना न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक-राजनीतिक और ऐतिहासिक रूप से भी राम मंदिर आंदोलन का सबसे निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।
राम जन्म भूमि सेवा समिति उसी वर्ष से लगातार रामलला का प्राकट्य उत्सव मनाती आ रही है। संयोग है कि इस बार 77वां प्राकट्योत्सव 23 दिसंबर को ही मनेगा, इसलिए 1949 की घटना को याद करना मौजू हो उठता है।
22 दिसंबर 1949 को पूस की रात थी। अयोध्या में सरयू के पानी में सर्द हवाएं सिहरन पैदा कर रही थी। इसी बीच लक्ष्मण किला घाट के पास पांच साधुओं ने सरयू में डुबकी लगाई और जब बाहर निकले तो देश की तारीख के नए अध्याय का सूत्रपात हो गया। सरयू स्नान करने वाले एक साधु के सिर पर बांस की टोकरी थी।
टोकरी में भगवान राम के बाल्यावस्था की अष्टघातु की मूर्ति थी। साधुओं की टोली विवादित परिसर पहुंची। चांदी के छोटे से सिंहासन पर रामलला की मंत्रोच्चार के साथ स्थापना हुई। उस दिन विवादित परिसर में हवलदार अब्दुल बरकत की ड्यूटी रात 12 बजे से थी। बरकत रात 12 बजे के बजाय करीब डेढ़ बजे पहुंचे।
उसके पहुंचने से पहले साधुओं ने विवादित परिसर में मूर्तियां स्थापित कर दी थी। ड्यूटी में लापरवाही पर अब्दुल बरकत ने जो दलील दी, वो अयोध्या आंदोलन के लिए बहुत अहम साबित हुई। बरकत ने रामलला के प्रकट होने की कहानी का समर्थन किया।
बरकत ने एफआईआर में बताया कि रात 12 बजे अलौकिक रोशनी हुई। रोशनी कम होने पर उसने जो देखा उस पर भरोसा नहीं हुआ। बरकत ने बताया कि वहां भगवान की मूर्ति विराजमान थी। अब्दुल बरकत का बयान चमत्कार का प्रमाण साबित हुआ।
तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट की ऐतिहासिक भूमिका
तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह के पौत्र शक्ति सिंह बताते हैं कि उस समय अयोध्या के जिलाधिकारी केके नैयर व सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह थे। सिटी मजिस्ट्रेट को कार्यभार देकर डीएम अवकाश पर चले गए। उधर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को विवादित परिसर से तत्काल मूर्ति हटवाने का निर्देश दिया।
जिलाधिकारी का कार्यभार देख रहे सिटी मजिस्ट्रेट ने प्रदेश सरकार को रिपोर्ट भेजी की इस समय मूर्ति हटाने से स्थिति अनियंत्रित हो सकती है, दंगा भड़क सकता है। बढ़ता दबाव देखते हुए उन्होंने सिटी मजिस्ट्रेट के पद से इस्तीफा दे दिया। त्यागपत्र देने से पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट ने दो ऐतिहासिक आदेश किए।
बाद में यही आदेश राम जन्मभूमि की मुक्ति का आधार बने। पहला आदेश पारित करते हुए विवादित परिसर क्षेत्र को धारा 155 में कुर्क करते हुए वहां शांति भंग न हो इसके लिए धारा 144 लागू कर दी। दूसरे आदेश में रामलला की मूर्ति के भोग प्रसाद व पूजन प्रतिदिन करने का आदेश हिंदुओं के पक्ष में कर दिया।







