पिथौरागढ़ जिले की सीमांत दारमा वैली (घाटी) में भूस्खलन का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (देहरादून) के हालिया अध्ययन में खुलासा हुआ है कि इस घाटी का 58 प्रतिशत इलाका भूस्खलन की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। हालात कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले 10 वर्षों (2015 से 2025) के भीतर ही यहां भूस्खलन की 295 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिहाज से भी यह घाटी बहुत महत्वपूर्ण है।
तीखा ढलान और दरकते पहाड़ बढ़ा रहे खतरा
भूस्खलन के लिए ढलान, ऊंचाई और ड्रेनेज व्यवस्था समेत 15 मुख्य कारणों की पहचान की गई है। घाटी में 45 से 55 डिग्री का तीखा ढलान है, जो खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। इसके अलावा दक्षिण दिशा की तरफ वाले पहाड़ों पर दिन में धूप अधिक देर तक रहने से चट्टानें गर्म हो जाती हैं और रात में अत्यधिक ठंड के कारण सिकुड़ती हैं। इस प्रक्रिया से पहाड़ों में दरारें आ रही हैं, जो भूस्खलन का बड़ा कारण बन रही हैं।
बारिश के बदलते पैटर्न ने किया ट्रिगर का काम
वैज्ञानिक मो. शावेज के मुताबिक, पहले इस क्षेत्र में लगातार तीन-चार दिनों तक बारिश नहीं होती थी, लेकिन अब बारिश का पैटर्न बदल गया है। बारिश के दिनों की संख्या बढ़ने से मिट्टी के अंदर पानी सोखने की क्षमता कम हो गई है। पोर वॉटर प्रेशर (मिट्टी के कणों के बीच पानी का दबाव) बढ़ने से जमीन ढीली हो जाती है और खिसकने लगती है। भारी बारिश के साथ छोटे-छोटे भूकंप के झटके यहां ट्रिगर का काम कर रहे हैं।
बड़े भूकंप और बारिश का संयुक्त रिस्क मैप तैयार
वाडिया के वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग मॉडल और सैटेलाइट नक्शों की मदद से भविष्य की आपदाओं का रिस्क मैप भी तैयार किया है। इसमें रिक्टर स्केल पर सात से आठ की तीव्रता वाले बड़े भूकंप और तेज बारिश के संयुक्त प्रभाव का आकलन किया गया है। अध्ययन के अनुसार, दारमा घाटी का करीब नौ प्रतिशत इलाका हाई से वेरी-हाई रिस्क (अत्यधिक खतरे) जोन में आता है, जबकि 22 प्रतिशत क्षेत्र मध्यम खतरे के दायरे में है।






