दिल्ली के सरकारी स्कूलों में होगी 10000 शिक्षकों की भर्ती, पूरी व्यवस्था में बदलाव की कवायद

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दिल्ली सरकार सरकारी स्कूलों में वर्षों से चली आ रही शिक्षकों की कमी दूर करने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कहना है कि करीब 10 हजार शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया अंतिम चरण में है और अगले एक-दो महीने में इसे पूरा करने का लक्ष्य है। अमर उजाला के आदित्य पाण्डेय से विशेष बातचीत में उन्होंने शिक्षा, मिशन कायाकल्प, यमुना की सफाई, कूड़े के पहाड़, स्वास्थ्य सेवाओं, ड्रेनेज मास्टर प्लान, प्रदूषण नियंत्रण और सरकार की कार्यशैली सहित कई अहम मुद्दों पर विस्तार से बात की। पेश हैं प्रमुख अंश…

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी लंबे समय से बड़ा मुद्दा रही है। आपकी सरकार इसे कैसे दूर करेंगी?
जब हमारी सरकार बनी तो सबसे पहले जिन गंभीर समस्याओं का आकलन किया गया, उनमें सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और प्रिंसिपलों की भारी कमी प्रमुख थी। वर्षों तक इस समस्या की अनदेखी हुई, जिसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ा। हमने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। करीब 10 हजार शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया चल रही है और हमारा लक्ष्य अगले एक-दो महीने में इसे पूरा करना है।

आपने मिशन कायाकल्प शुरू किया है। इसके तहत सरकारी स्कूलों में क्या बदलाव किए जा रहे हैं?
हमारा उद्देश्य है कि सरकारी स्कूल का हर बच्चा बेहतर और सम्मानजनक माहौल में पढ़ाई करे। इसी सोच के साथ मिशन कायाकल्प शुरू किया गया। गर्मी की छुट्टियों के दौरान विभिन्न विभागों ने मिलकर स्कूलों में व्यापक सुधार किए। भवनों की मरम्मत, दीवारों का प्लास्टर, खिड़कियों की मरम्मत, शौचालयों में गेट, साफ-सफाई, वाटर प्यूरीफायर और कई स्कूलों में आकर्षक चित्रकारी जैसे काम किए गए हैं।
सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों के बराबर लाने के लिए आगे क्या योजना है?
हम केवल छोटे-मोटे सुधार नहीं कर रहे, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव ला रहे हैं। 75 मुख्यमंत्री श्री स्कूलों को और अधिक सुदृढ़ किया जा रहा है। हमारा लक्ष्य है कि यहां बच्चों को वही गुणवत्ता मिले, जिसकी अपेक्षा लोग अच्छे निजी स्कूलों से करते हैं। बेहतर भवन, आधुनिक सुविधाएं, प्रशिक्षित शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर एक साथ काम हो रहा है। हमारी कोशिश केवल घोषणाएं करने की नहीं, बल्कि परिणाम देने की है।

दिल्ली के तीनों कूड़े के पहाड़ लंबे समय से बड़ी समस्या रहे हैं। सरकार इन्हें खत्म करने के लिए क्या कर रही है?
हमें कई समस्याएं विरासत में मिली हैं और कूड़े के पहाड़ उनमें प्रमुख हैं। गाजीपुर, भलस्वा और ओखला लैंडफिल साइटों पर पुराने कचरे को तेजी से हटाया जा रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी से इस विषय पर चर्चा हुई है। अब लैंडफिल से निकलने वाले इनर्ट मैटेरियल का उपयोग राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में मिट्टी भराई के लिए किया जा रहा है। इससे लैंडफिल की ऊंचाई लगातार घट रही है। हमें विश्वास है कि आने वाले समय में ये कूड़े के पहाड़ इतिहास बन जाएंगे।

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यमुना की सफाई को लेकर आपकी सरकार की क्या रणनीति है?
यमुना दिल्ली की जीवनरेखा है और इसकी सफाई हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। दिल्ली में प्रतिदिन करीब 1500 टन गोबर निकलता है, जिसका बड़ा हिस्सा नालों के जरिए यमुना तक पहुंचता रहा है। इसे रोकने के लिए दिल्ली में पहला गोबर गैस प्लांट शुरू किया गया है। आगे और भी ऐसे प्लांट लगाए जाएंगे ताकि गोबर का वैज्ञानिक उपयोग हो और वह यमुना में न पहुंचे। इस अभियान में केंद्र सरकार का भी पूरा सहयोग मिल रहा है।

आपने कहा है कि यमुना की मौजूदा स्थिति पिछली सरकार की विरासत है। ऐसा क्यों मानती हैं?
जब हमने जिम्मेदारी संभाली तो सीवेज सिस्टम लगभग ठप था। घरेलू गंदा पानी और औद्योगिक अपशिष्ट बिना पर्याप्त शोधन के सीधे यमुना में पहुंच रहा था। हमने 29 नए डीसेंट्रलाइज्ड एसटीपी बनाने का काम शुरू किया है। साथ ही, 20 से 22 प्रमुख नालों पर बने एसटीपी को पूरी क्षमता से संचालित करने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। इससे यमुना के जल की गुणवत्ता में सुधार दिखाई देगा।

आपने 56 हजार करोड़ रुपये के ड्रेनेज मास्टर प्लान का जिक्र किया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता क्या होगी?
यह पूरी दिल्ली के जल निकासी तंत्र को वैज्ञानिक आधार पर विकसित करने की योजना है। जहां जरूरत होगी, वहां नई संरचनाएं बनाई जाएंगी और पुराने सिस्टम को मजबूत किया जाएगा। हमारा लक्ष्य है कि भविष्य में हर मानसून के दौरान जलभराव जैसी समस्या से लोगों को राहत मिले।

इस वर्ष नालों की सफाई को लेकर सरकार लगातार दावा कर रही है। जमीन पर क्या-क्या बदलाव हुए हैं?
इस बार रिकॉर्ड स्तर पर करीब तीस लाख मीट्रिक टन सिल्ट नालों से निकाली गई है। साफ नालों से बारिश का पानी तेजी से निकलेगा। पिछली बारिश में मिंटो ब्रिज जैसे संवेदनशील इलाके में जलभराव नहीं हुआ, जो हमारी तैयारियों का परिणाम है। पीडब्ल्यूडी, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग, डीडीए, एमसीडी और ट्रैफिक पुलिस की संयुक्त टीमें लगातार निगरानी करेंगी। जरूरत वाले स्थानों पर अतिरिक्त पंप भी लगाए जाएंगे।

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सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भारी भीड़ रहती है। स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए क्या किया जा रहा है?
दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में प्रतिदिन करीब पांच लाख मरीज ओपीडी में आते हैं। इतने दबाव के बावजूद हमारा प्रयास है कि किसी भी मरीज को अनावश्यक परेशानी न हो। ओपीडी के टाइम-टेबल से लेकर मरीजों की एंट्री व्यवस्था तक को डिजिटल बनाया गया है। अस्पतालों में दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों को लगातार शामिल किया जा रहा है।

आपने सभी विभागों में ई-ऑफिस व्यवस्था लागू करने की बात कही है। इससे आम जनता को क्या लाभ मिलेगा?
हमारा मानना है कि पारदर्शिता से जनता का भरोसा बढ़ता है। ई-ऑफिस प्रणाली से फाइलों का निस्तारण तेज हुआ है, जवाबदेही बढ़ी है और अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप कम हुआ है। इससे लोगों के काम पहले की तुलना में अधिक तेजी से होंगे।

दिल्ली में प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार की नई रणनीति क्या है?
प्रदूषण नियंत्रण के लिए कई अहम कदम उठाए गए हैं। ‘’नो पीयूसी, नो फ्यूल’’ नीति लागू की गई है और नियम तोड़ने वालों के लिए जुर्माने का प्रावधान किया गया है। सर्दियों में बीएस-6 मानकों से नीचे के बाहरी राज्यों के व्यावसायिक वाहनों के प्रवेश पर सख्ती की जाएगी। नई ईवी पॉलिसी भी लागू की जा रही है। इसके अलावा 7 जुलाई से पूरे दिल्ली में 70 लाख पौधे लगाने का अभियान शुरू होगा, जिसका शुभारंभ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह करेंगे। हरियाली बढ़ाने से भी प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी।

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आपकी सरकार और पिछली सरकार की कार्यशैली में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
दिल्ली की जनता खुद पिछले वर्षों और आज के कामकाज का अंतर देख रही है।


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