कश्मीर घाटी में 1989-90 के दौर में भड़की आतंकी हिंसा और कश्मीरी पंडितों के पलायन के तीन दशक से अधिक समय बाद जम्मू-कश्मीर प्रशासन और जांच एजेंसियों ने अनसुलझे आतंकी हत्याकांडों की फाइलें खोलने के क्रम में वंधामा नरसंहार की जांच 28 साल बाद आधिकारिक तौर पर दोबारा शुरू कर दी है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने हालिया उच्चस्तरीय सुरक्षा बैठकों में जांच एजेंसियों को आतंकवाद और मानवाधिकार उल्लंघन के पुराने मामलों को दोबारा खोलकर पीड़ितों को न्याय दिलाने के निर्देश दिए थे।
एसआईए के एसएसपी ताहिर अशरफ ने अमर उजाला से बातचीत में इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि जांच एजेंसी ने वंधामा नरसंहार और पुराने टारगेट किलिंग मामलों के सिलसिले में कश्मीर घाटी में कई संदिग्ध ठिकानों पर सघन छापा मारा है। एसआईए का मुख्य उद्देश्य उन आतंकियों, उनके जीवित मददगारों और ओवरग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) की पहचान करना है, जिन्होंने इन साजिशों को अंजाम देने के लिए हथियार, साजो-सामान और पनाह मुहैया कराई थी।
पुनः जांच के दायरे में प्रमुख मामले
जस्टिस नीलकंठ गंजू हत्याकांड (1989) : जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस नीलकंठ गंजू ने जेकेएलएफ संस्थापक मकबूल भट को मौत की सजा सुनाई थी। 1989 में श्रीनगर की हरि सिंह स्ट्रीट में आतंकियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी।
टीका लाल टपलू हत्याकांड (1989) : वरिष्ठ वकील, भाजपा नेता और कश्मीरी पंडित समुदाय के प्रमुख चेहरे टीका लाल टपलू की श्रीनगर में उनके घर के पास टारगेट किलिंग की गई थी। इस घटना को घाटी से कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन से पहले की प्रमुख घटनाओं में गिना जाता है।
सरला भट हत्याकांड (1990): एसआईए ने 1990 में नर्स सरला भट की हत्या के मामले में हाल ही में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें यासीन मलिक को मुख्य साजिशकर्ता बनाया गया है।








