श्रीनगर – तीन दशक बाद खुलीं कश्मीरी पंडितों के हत्याकांड की फाइलें, वंधामा समेत पुराने मामलों की जांच शुरू

कश्मीर घाटी में 1989-90 के दौर में भड़की आतंकी हिंसा और कश्मीरी पंडितों के पलायन के तीन दशक से अधिक समय बाद जम्मू-कश्मीर प्रशासन और जांच एजेंसियों ने अनसुलझे आतंकी हत्याकांडों की फाइलें खोलने के क्रम में वंधामा नरसंहार की जांच 28 साल बाद आधिकारिक तौर पर दोबारा शुरू कर दी है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने हालिया उच्चस्तरीय सुरक्षा बैठकों में जांच एजेंसियों को आतंकवाद और मानवाधिकार उल्लंघन के पुराने मामलों को दोबारा खोलकर पीड़ितों को न्याय दिलाने के निर्देश दिए थे।

प्रशासन ने 1990 के दौर के पूरे टेरर इकोसिस्टम की पहचान करने के निर्देश दिए हैं। इसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो उस समय आतंकियों के मददगार थे और आज भी किसी न किसी रूप में तंत्र में मौजूद हो सकते हैं। जिलाधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (एसएसपी) को नई एफआईआर दर्ज करने, साक्ष्य जुटाने तथा आतंकी हिंसा का शिकार बने परिवारों को प्राथमिकता के आधार पर सरकारी सहायता और स्वरोजगार उपलब्ध कराने के साथ उनकी कब्जाई गई जमीनों और संपत्तियों को वापस दिलाने की प्रक्रिया में तेजी लाने को कहा गया है।
बंधामा की खौफनाक वारदात 25 जनवरी 1998 की रात मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के वंधामा गांव में हुई थी। 26 जनवरी की पूर्व संध्या और रमजान के पवित्र महीने में शब-ए-कद्र की रात सेना की वर्दी में आए हथियारों से लैस आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों के घरों में धावा बोल दिया था। आतंकियों ने चार परिवारों के सदस्यों को एक जगह इकट्ठा कर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इसमें नौ महिलाओं और चार बच्चों समेत कुल 23 कश्मीरी पंडितों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। मारे गए लोगों में जम्मू से अपने रिश्तेदारों से मिलने आए पांच मेहमान भी शामिल थे। इस भीषण वारदात के बाद पूरे देश में भारी आक्रोश फैला था, लेकिन दशकों तक यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा।

एसआईए के एसएसपी ताहिर अशरफ ने अमर उजाला से बातचीत में इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि जांच एजेंसी ने वंधामा नरसंहार और पुराने टारगेट किलिंग मामलों के सिलसिले में कश्मीर घाटी में कई संदिग्ध ठिकानों पर सघन छापा मारा है। एसआईए का मुख्य उद्देश्य उन आतंकियों, उनके जीवित मददगारों और ओवरग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) की पहचान करना है, जिन्होंने इन साजिशों को अंजाम देने के लिए हथियार, साजो-सामान और पनाह मुहैया कराई थी।

पुनः जांच के दायरे में प्रमुख मामले

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जस्टिस नीलकंठ गंजू हत्याकांड (1989) : जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस नीलकंठ गंजू ने जेकेएलएफ संस्थापक मकबूल भट को मौत की सजा सुनाई थी। 1989 में श्रीनगर की हरि सिंह स्ट्रीट में आतंकियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी।

टीका लाल टपलू हत्याकांड (1989) : वरिष्ठ वकील, भाजपा नेता और कश्मीरी पंडित समुदाय के प्रमुख चेहरे टीका लाल टपलू की श्रीनगर में उनके घर के पास टारगेट किलिंग की गई थी। इस घटना को घाटी से कश्मीरी पंडितों के सामूहिक पलायन से पहले की प्रमुख घटनाओं में गिना जाता है।

सरला भट हत्याकांड (1990): एसआईए ने 1990 में नर्स सरला भट की हत्या के मामले में हाल ही में 737 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें यासीन मलिक को मुख्य साजिशकर्ता बनाया गया है।

सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे की हत्या (1990): प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित लेखक सर्वानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे वीरेंद्र कौल का अनंतनाग से अपहरण कर बेरहमी से कत्ल कर दिया गया था। इस मामले में भी नए सिरे से तलाशी अभियान चलाया गया है।
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