उत्तराखंड : आज लोकपर्व इगास, यह पर्व जुड़ा है माधो सिंह भंडारी की बहादुरी से, पढ़ें इतिहास ।

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राजशाही दौर में इगास पर्व मनाए जाने की यहां अलग ही कहानी जुड़ी है। कहा जाता है कि 17वीं सदी में जब वीर भड़ माधो सिंह भंडारी तिब्बत की लड़ाई लड़ने गए थे, तब लोगों ने दीपावली नहीं मनाई थी। लेकिन जब वह रण जीतकर लौटे, तो दीयों से पूरे क्षेत्र को रोशन कर इगास का पर्व दीपावली के रूप में मनाया गया। तभी से इगास (बूढ़ी दीपावली) धूमधाम से मनाई जाती है। उत्तराखंड के पौड़ी जिले में विकासखंड कीर्तिनगर का मलेथा गांव वीर भड़ माधो सिंह भंडारी की त्याग, तपस्या और बलिदान की कहानी से जुड़ा है।वीर माधो सिंह ने मलेथा गांव की उपजाऊ भूमि की सिंचाई के लिए गांव के दायीं ओर चंद्रभागा नदी से पानी पहुंचाने का दृढ़ निश्चय किया था। इसके लिए उन्होंने गूल निर्माण में बाधा बन रही पहाड़ी को खोदकर सुरंग का निर्माण किया था, जो आज भी इंजीनियरिंग का अनूठा उदाहरण है। बताते हैं कि जब सुरंग से पानी आगे नहीं बढ़ा तो उन्होंने अपने इकलौते पुत्र की बलि दे दी। माधो सिंह भंडारी छोटी उम्र में ही शाही सेना में भर्ती हो गए थे। उनकी वीरता और कौशल को देखते हुए पंवार वंश के तत्कालीन राजा महिपत शाह ने उन्हें सेनाध्यक्ष बना दिया। उनके नेतृत्व में राजा ने तिब्बत के दावा क्षेत्र पर हमला बोल दिया। रणभूमि में डटे होने से माधो सिंह दीपावली मनाने अपने घर नहीं पहुंच पाए।
गढ़वाल की सेना के युद्ध में जाने की वजह से यहां दीपावली के दिन घरों में दीपक नहीं जले। कार्तिक एकादशी के दिन जब माधो सिंह भंडारी अपनी सेना के साथ लड़ाई जीत कर लौटे तो पूरे राज्य में इगास का त्योहार दीपावली की तर्ज पर मनाया गया। वीर माधो सिंह भंडारी ने जिस कृषि भूमि के लिए करीब 80 मीटर सुरंग का निर्माण कर अपने पुत्र का भी बलिदान दे दिया, आज वह उपजाऊ कृषि भूमि सिमटने लगी है। भूमि का अधिकांश हिस्सा रेल विकास निगम की ओर से अधिग्रहित किया गया है। इसके अलावा होटल और रेस्टारेंट का निर्माण भी इस भूमि पर होने लगा है।
वहीं टिहरी जिले के बूढ़ाकेदार में मंगसीर बग्वाल की सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवंत है। भिलंगना ब्लाक के थाती-कठुड़ क्षेत्र में गुरू कैलापीर के आगमन पर यह त्योहार दिवाली पर्व की भांति हर्षोल्लास से मनाया जाता है। बग्वाल मनाने देश-विदेश में रहने वाले लोग और विवाहित बेटियां बड़ी संख्या में अपने गांव पहुंचती हैं। मान्यता है कि करीब छह सौ साल पहले चंपावत में विराजमान गुरू कैलापीर की पूजा-अर्चना में वहां अक्सर विघ्न आने पर देवता अपने 54 चेलों और 52 वीरों के साथ दीपावली के एक माह बाद बूढ़ाकेदार पहुंचे थे। देवता के थाती-कठुड़ में आकर विराजमान होने की खुशी में क्षेत्र के लोगों ने दिवाली मनाई थी। बूढ़ाकेदार मंदिर समिति के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह नेगी और मीडिया प्रभारी डीएस गुनसोला ने बताया कि तभी से हर साल मंगसीर की दिवाली धूमधाम से मनाने की परंपरा चली आ रही है।
इसी तरह थाती-कठुड़ क्षेत्र में चतुर्दशी और अमावस्या को दो दिवसीय बग्वाल और तीन दिवसीय बलराज मेला आयोजित होता है। वहीं बूढ़ाकेदार में मंगसीर बग्वाल पांच दिनों तक मनाई जाती है। इस बार यह पर्व दो-तीन दिसंबर को मनाया जाएगा और छह दिसंबर तक बलराज मेला होगा। नब्बे जूल के लोग अपने आराध्य देव श्री गुरू कैलापीर देवता के दर्शन करने के लिए बड़ी संख्या में बूढ़ाकेदार पहुंचते हैं। गुरू कैलापीर के मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद लोग मंदिर के पास एकत्रित होकर ढोल-दमाऊं की थाप पर भैलो खेलते हैं। दूसरे दिन सुबह से मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद देवता से मंदिर से बाहर आकर दर्शन देने की मन्नत मांगते हैं। इस दौरान ढोल-नगाड़े और रणसिंगे की धुन के साथ वहां एकत्रित सैकड़ों लोग खूब सीटी बजाते हैं।
सात गांवों के ठकुराल ढोल-दमाऊं के साथ दोपहर को मंदिर पहुंचते हैं, उसके बाद ही गुरू कैलापीर बाहर आकर खेत में पहुंचते हैं। फिर देवता निशान के साथ खेतों में दौड़ लगाते हैं। मेले में पहुंचे सैकड़ों लोग भी निशान के साथ खेतों में दौड़ लगाकर पुण्य अर्जित कर मन्नत मांगते हैं। बहू-बेटियां मन्नत पूरी होने पर देवता को भेंट चढ़ाती हैं। खेतों में सात चक्कर लगाने के बाद देवता मंदिर में अपने स्थान पर विराजमान हो जाते हैं। उसके बाद तीन दिनों तक भव्य बलराज मेला लगता है, जिसमें आस-पास गांव की महिलाएं और बच्चे खूब खरीदारी करते हैं।

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