उतनी ही जरूरत आज भी है सुंदरलाल बहुगुणा के संघर्ष की, इस तरह आगे बढ़ेगी उनकी विरासत.। खबर पूरी विस्तार से….

Spread the love

प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा अब हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, शराब और पेड़ों के अंधाधुंध कटान के खिलाफ संघर्ष की जो लौ जलाई, उसके ज्वाला बनने का आज भी इंतजार है। उनके संघर्षों की प्रेरणा ही इन ज्वलंत सवालों के उत्तर खोजेगी। अलग-अलग हिस्सों में चल रहे पर्यावरण के संघर्ष ही बहुगुणा की विरासत को आगे बढ़ाने का काम करेंगे।  सुंदरलाल बहुगुणा ने कोरोना से संघर्ष करते हुए इस दुनिया को अलविदा कह दिया। समाज की अपनी गतिकी है। व्यक्ति संघर्षों का चेहरा बनता है तो साथ ही साथ वे संघर्ष भी व्यक्ति को गढ़ते हैं, उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। जब तमाम लोग बहुगुणा जी को उनके जाने के बाद याद कर रहे हैं तो यह उन तमाम मसलों को याद करना भी है, जिन के साथ वे जीवन भर जूझते रहे।

भाकपा नेता व सामाजिक कार्यकर्ता इंद्रेश मैखुरी ने बताया कि पेड़, पहाड़, नदियों के संरक्षण के साथ ही समाज में व्याप्त विभिन्न कुरीतियों के खिलाफ भी सुंदरलाल बहुगुणा ने आंदोलन चलाए। एक दौर था टिहरी में जब दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए कई आंदोलन चले। सुंदरलाल बहुगुणा ने उन आंदोलनों का नेतृत्व किया। जीवन शैली और गैजेट्स के उपयोग में आई तमाम आधुनिकता के बावजूद जातीय भेदभाव आज भी हमारे समाज के माथे पर धब्बा है। उत्तराखंड के समाज में जाति की जकड़न बाकी देश के मुकाबले ऊपरी तौर पर ‘अंडर करंट’ जैसी अवस्था में रहती है, लेकिन जब वह उभरती है तो बेहद विकृत रूप में प्रकट होती है। 

और पढ़े  भीमताल- बिरला इंस्टीट्यूट पहुंचे CM धामी, बिरला संस्थान में 3 दिवसीय कार्यक्रम का किया शुभारंभ

अभी दो साल पहले टिहरी जिले के ही जौनपुर क्षेत्र में एक दलित युवक की शादी में कुर्सी पर बैठने के कारण पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। कौन कह सकता है कि ऐसी शर्मसार करने वाली घटना उसी टिहरी जिले में 21वीं सदी में हुई, जिसमें सुंदरलाल बहुगुणा जैसे लोगों ने दलितों के मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन चलाए। जिस टिहरी जिले में 1950 के दशक में जातीय जकड़बंदी को तोड़ने के लिए तीन अलग-अलग जातियों के परिवार 12 वर्ष तक संयुक्त रूप से परिवार की तरह एक ही छत के नीचे रहे। निश्चित ही जातीय भेदभाव से मुक्ति की लड़ाई मंदिर प्रवेश से अधिक दिमाग से जाति के जहर को बाहर निकालने की लड़ाई है और उसे वहां तक पहुंचाना ही होगा। 

शराबबंदी के संघर्ष बहुगुणा जी और उनकी जीवनसंगिनी विमला जी ने चलाए। आज राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत बताकर शराब तो सरकारें ही गांव-गांव में पहुंचा रही हैं। शराब को ‘राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत’ बताना एक मिथक है, जिसे इसके दुष्प्रभावों को वैधता प्रदान करने के लिए गढ़ा गया है। आज नशा सिर्फ शराब तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह जितने रूप में समाज को खोखला कर रहा है, उससे निपटने के लिए बहुत बड़ी लड़ाई की जरूरत है।

टिहरी बांध के खिलाफ संघर्ष सुंदरलाल बहुगुणा जी के जीवन का बड़ा संघर्ष था। आज टिहरी से कई गुना बड़े पंचेश्वर बांध का खतरा उत्तराखंड के सिर पर मंडरा रहा है। टिहरी के बाद जलविद्युत परियोजनाओं को छोटी, रन ऑफ द रिवर कह कर उत्तराखंड के चप्पे-चप्पे पर कायम करने की कोशिश की गई। हकीकत यह है कि वे न छोटी हैं, न ही रन ऑफ द रिवर। वे नदियों की पारिस्थितिकी को ही नष्ट करने वाली सुरंग आधारित परियोजनाएं हैं। उनके दुष्परिणाम 2013 में हमने देखे और इसी साल सात फरवरी को उनकी तबाही से हम फिर दो-चार हुए।

और पढ़े  US-Iran-: इस्लामाबाद शांति वार्ता पर संशय बरकरार, जेडी वेंस पाकिस्तान रवाना, ईरान ने चुप्पी साधी

बड़ी पूंजी के एकाधिकार का दौर बहुत तेजी पर है। आज जो विकास का मॉडल हमारे देश में है, प्रकृति के साथ सामंजस्य कायम करने वाला विकास का मॉडल नहीं है बल्कि आक्रांता किस्म का विकास का मॉडल है। विकास के इस विनाशकारी मॉडल से नदी, पहाड़, जंगल और जमीन को बचाने की चुनौती आज बहुगुणा जी के दौर से कहीं बड़ी चुनौती है। अपने हिस्से का संघर्ष उन्होंने किया, आगे का संघर्ष उनकी लड़ाइयों से प्रेरणा और सबक,दोनों लेकर हमें करना होगा।

बहुगुणा के वैश्विक प्रभाव का लाभ नहीं ले पाए हम
वनाधिकार आंदोलन के प्रणेता व टिहरी के पूर्व विधायक किशोर उपाध्याय ने बताया कि बहुगुणा जी जब टिहरी में तीन धारे के पास टिहरी बांध के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे तो मैं उनसे मिलने गया। वह मेरे बारे में पहले से जानते थे और पहली बार हिमालय के पर्यावरणीय पहलुओं को उनसे बारीकी से समझा। 1991-92 में हिमालय के विकास के लिए सतत समावेशी नीति के बारे में, उत्तरकाशी को उसका मॉडल बनाने के लिए जब पूरा योजना आयोग टिहरी आया तो योजना आयोग के वरिष्ठ सलाहकार बीएन नवलावाला ने कहा कि टिहरी जाने पर मेरी पहली इच्छा बहुगुणा जी को मिलने की है।


Spread the love
  • Related Posts

    गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय- गौतमबुद्ध विवि के कुलसचिव डॉ. विश्वास त्रिपाठी बर्खास्त, योग्यता पूरी न करने पर की गई कार्रवाई

    Spread the love

    Spread the loveनिर्धारित न्यूनतम शैक्षणिक एवं प्रशासनिक योग्यता पूर्ण न करने के कारण गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. विश्वास त्रिपाठी की सेवा समाप्त कर दी गई है। प्रभारी कुलसचिव…


    Spread the love

    होर्मुज: ‘खाड़ी से ओमान तक कोई बंदरगाह नहीं रहेगा सुरक्षित’, अमेरिका की नाकेबंदी वाली धमकी पर ईरान का पलटवार

    Spread the love

    Spread the loveईरान-अमेरिका के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी का एलान कर दिया है। इसके जवाब में ईरान ने सख्त चेतावनी दी। ईरान…


    Spread the love

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *