SC- मुआवजा देने में देरी पर कौन भरेगा जुर्माना? सुप्रीम कोर्ट ने तय किया नियोक्ता का दायित्व

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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत मुआवजे की राशि जमा करने में देरी होने पर जुर्माना भरने का दायित्व नियोक्ता का होगा। शीर्ष कोर्ट ने कहा, यह कानून कर्मचारियों की शिकायतों के निवारण के लिए बनाया गया एक सामाजिक कल्याण कानून है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने कहा, इस अदालत ने अपने कई फैसलों में इस अधिनियम की उदार और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या पर जोर दिया है, जो कर्मचारियों के हित में है, क्योंकि यह एक सामाजिक कल्याण कानून है। पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के मई, 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली एक बीमा कंपनी द्वारा दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया।

हाईकोर्ट ने अधिनियम की धारा 4ए(3)(बी) के तहत लगाए गए जुर्माने का भुगतान करने का दायित्व बीमा कंपनी पर डाला था। शीर्ष न्यायालय ने 23 फरवरी को सुनाए फैसले में कहा कि उक्त कानून के उद्देश्यों के विवरण का अवलोकन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कानून संसद द्वारा लाया गया एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसका उद्देश्य रोजगार के दौरान या रोजगार के समय होने वाली दुर्घटनाओं के मामले में कर्मचारियों की शिकायतों का निवारण करना और उन्हें शीघ्रता से पर्याप्त मुआवजा प्रदान करना है।

 

कोर्ट ने फैसले में इस बात पर दिया जोर
कोर्ट ने फैसले में नोट किया कि व्यावसायिक चालक के रूप में कार्यरत एक कर्मचारी की फरवरी, 2017 में वाहन चलाते समय मृत्यु हो गई थी। उसके कानूनी वारिसों ने दिल्ली सरकार के श्रम विभाग के आयुक्त के समक्ष 1923 के अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग करते हुए एक दावा याचिका दायर की थी। नवंबर, 2020 में, आयुक्त ने माना कि इस मामले में नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध मौजूद था और चूंकि मौत काम (रोजगार) के दौरान हुई थी, इसलिए नियोक्ता दावेदारों को मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी था।

आयुक्त ने ब्याज सहित मुआवजे की राशि 7,36,680 रुपये निर्धारित की। यह देखते हुए कि वाहन वैध रूप से बीमित था और दुर्घटना बीमा अवधि के दौरान हुई थी, आयुक्त ने नियोक्ता को मुआवजा अदा करने का आदेश दिया। नियोक्ता को मुआवजे की राशि बीमा कंपनी से वसूल करने का उत्तरदायित्व भी दिया गया। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि आयुक्त ने नियोक्ता को एक महीने के भीतर मुआवजा अदा न करने पर कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था कि मुआवजे की राशि के 50 प्रतिशत से अधिक का जुर्माना क्यों न लगाया जाए।

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बीमा कंपनी ने मुआवजा और ब्याज चुकाने की हामी भरी
नियोक्ता ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जिसने मई 2025 में आदेश पारित किया। हाईकोर्ट ने जुर्माना भरने का दायित्व भी बीमा कंपनी पर डाल दिया। बीमा कंपनी ने अधिनियम के तहत जुर्माने के भुगतान के लिए दायित्व निर्धारित करने के आदेश से असंतुष्ट होकर सुप्रीम कोर्ट में अपील की। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बीमा कंपनी ने अधिनियम की धारा 4ए(3)(बी) के तहत मुआवजे और ब्याज सहित 7,36,680 रुपये की राशि का भुगतान करने की अपनी जिम्मेदारी निर्विवाद रूप से स्वीकार की और जिसमें जिसमें मृत्यु की तारीख से भुगतान तक का अतिरिक्त ब्याज भी शामिल है।

आठ हफ्ते में जुर्माना भरे नियोक्ता
पीठ ने कहा, जब कानून स्वयं नियोक्ता को एक महीने के भीतर भुगतान करने के लिए बाध्य करता है, तो इस दायित्व को किसी कॉन्ट्रैक्ट के अधीन या वैधानिक दायित्व को दरकिनार करने के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह उक्त प्रावधान के तहत परिकल्पित विधायी आशय की अवहेलना के समान होगा। अपील को स्वीकार करते हुए अदालत ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें बीमा कंपनी पर जुर्माना अदा करने का दायित्व लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, नियोक्ता का दायित्व है कि वह आयुक्त द्वारा दिनांक 8 फरवरी, 2021 के आदेशानुसार 2,57,838 रुपये का जुर्माना आज से आठ सप्ताह के भीतर अदा करे।


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